चैतन्य-प्रकृति और जड़ प्रकृति में मौलिक रूप से यह अन्तर पाया जाता है कि जड़ प्रकृति में परमाणु अणु और अणु रचित पिण्डों के रूप में प्राप्त होते हैं जबकि चैतन्य-प्रकृति (एक ही स्वतंत्र) परमाणु के रूप में ही वर्तमान रहती है। चैतन्य परमाणु में ही अक्षय शक्तियाँ होने के कारण प्रत्येक (मानव) इकाई अपने में जीवन वैभव और महिमा का अनवरत प्रकाशन करती है। जड़ शक्तियाँ क्षरणशील होती हैं और चैतन्य शक्तियाँ अक्षय होती हैं। इसी तथ्यवश चैतन्य इकाई में परावर्तन और प्रत्यावर्तन स्वाभाविक रूप में होता है। (*जड़ प्रकृति में मात्र परावर्तन होता है) – भ.व. 88
सहअस्तित्व विधि अपने आप सार्वभौम होना स्वाभाविक है। सहअस्तित्व अपने में सम्पूर्ण अस्तित्व की ध्वनि को ध्वनित करता है। सम्पूर्ण अस्तित्व अपने में चार पद, चार अवस्थाओं में होना पाया जाता है। इसमें से चार पद प्राणपद, भ्रान्तिपद, देवपद, दिव्यपद के रूप में अध्ययन होता है। चार अवस्थाएँ पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था, ज्ञानावस्था में गण्य होती है। ऐसी स्वीकृतियाँ बहुत जटिल भी नहीं हैं। पदार्थावस्था के मूल में सम्पूर्ण प्रजाति के परमाणुओं का अध्ययन है। इनमें से कुछ प्रजातियों को मानव पहचाना भी है। नहीं पहचानी हुई प्रजातियाँ पहचान में आने की सम्भावना बनी हुई है। इस मुद्दे पर पहले भी जिक्र हुआ है कितनी प्रजाति के परमाणु होना संभावित है यह स्पष्ट किया जा चुका है। भौतिक परमाणु 120 या 121 संख्या में होने की बात सूचित हो चुकी है इनमें से 60 भूखे परमाणु के कोटि में, अन्य अजीर्ण कोटि में गण्य है। चैतन्य परमाणु अपने में एक ही प्रजाति का होता है। चैतन्य इकाई की प्रजाति एक होते हुए भी जीने की आशा के आधार पर अपने में स्वयं स्फूर्त कार्य, गति, पथ भिन्न-भिन्न आकार का होता है यह पुंजाकार ही होता है। पुंजाकार का तात्पर्य एक अलातचक्र अनुभव किया जाता है। अलातचक्र का तात्पर्य रस्सी के एक छोर में आग लगाकर घुमाने से आंखो से सभी ओर आग दिखाई देती है जबकि आग रस्सी के एक छोर में ही रहती है। पंखा जब घूमने लगता है एक गोलाकार चक्र जैसा दिखता है जीवन परमाणु अपने में गठनपूर्ण होते हुए संख्या में एक होता है। यही आशा की गति में गतित होना पाया जाता है। उस गति को मानव संख्या में लाना संभव नहीं है इसी आधार पर जीवन गति अन्य सभी गति को नाप तौल के रूप में परिगणित कर लेता है। कार्य, गति, पथ सहित जीवन अपने में एक आकार प्रकार हो जाता है इस आकार प्रकार का शरीर रचना किसी अंडज पिंडज संसार में बना ही रहता है। जीवन जीने की आशा सहित होने के आधार पर शरीर को जीवन माना रहता है। मानव परम्परा में ऐसी शरीर रचना रचित हो चुकी है जिसको चलाने के क्रम में जागृति की आवश्यकता महसूस होना और प्रमाणित होना है। इसी तथ्यवश मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद तथ्य उद्घाटन करने के लिए प्रस्तुत हुआ। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव होना पाया गया है। शरीर के साथ जीवन न होने की स्थिति में मृतक माना जाता है। – ज.व. 176-179