(F) देखना = समझना

(i) कल्पना आँखों से अधिक है

मानव यह आदिकाल से मानते ही आया है कि हमें दिखता है। देखने की मूल क्रिया आँखों को माना गया है, आँखों में जैसा भी दिखता है वह हाथों से वैसा, हाथों के जैसा नाक से, नाक जैसा कान से, कानों से जैसा जीभ से, न दिखकर हर वस्तु का विभिन्न आयाम उन-उन ज्ञानेन्द्रियों से पहचान में आता है। जैसे कि एक आँवले को आँखों से देखने से, जीभ से, और हाथों से देखने पर विभिन्न आयाम दिखती है, गंध से भी भिन्न आयाम दिखाई पड़ती है, आँखों से केवल आकार, आयतन, घन में से आकार आयतन का कुछ अंश समाता है और चीजें आँखों में आती नहीं। इन आँखों से देखे हुए एक मार्ग को देखने पर भी मार्ग की चौड़ाई कुछ दूरी तक लम्बाई आँखों से आती है। कहाँ तक मार्ग गया है, वहाँ तक आँखों से दिखाई आता नहीं है; जहाँ तक आदमी को जाना है वहाँ तक मार्ग है, यह तथ्य समझ में आता है।

यह भी मानव सोच कर देखा है, स्मृति के आधार पर यह सब समझकर जो आँखों में नहीं आता है वह सब सुना हुआ है। आदमी से सुनकर स्मृतियों के रूप में क्या चीज पाया यह सोचा गया। उनमें बहुत दिन तक यह मानते रहे सिर में कोई चीज है वहाँ स्मृतियाँ रहती हैं। अन्ततोगत्वा बुद्घिजीवी और तकनीकी मानव ने सिर को भी खोलकर देख लिया वहाँ भी शरीर के अंग अवयव के रचना में भागीदारी किया हुआ वस्तु और द्रव्य ही दिखाई पड़ा। इसी के साथ सूक्ष्मतर नस जालों के रूप में बिछी देखा गया। पहले से पता लगाये हुए मांस-पेशियाँ भाग में था ही-आँख, कान, नाक, गला तंत्र और सिर भाग में बनी हुई ये मेधस तंत्र और मेधस तंत्र से जुड़ी हुई विधियों को अध्ययन किया जा चुका है।

उक्त देखने की परिकल्पना विधि से मानव पर जो कुछ भी प्रतिबिम्बित, प्रभावित रहता है वह सब मानव के लिये देखने की वस्तु के रूप में रहता ही है। उल्लेखनीय तथ्य यही है आँखों से अथवा सभी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा देखा हुआ वस्तु अपने स्वरूप में दिखता नहीं। यह बात सर्वेक्षण पूर्वक प्रमाणित होता है कि आँखों पर ही वस्तु का सर्वाधिक भाग प्रतिबिम्बित होता है। बाकी अन्य प्रणालियों से उतना अधिक भाग चित्रित नहीं हो पाता है। आँख के अनन्तर शब्द और कहानी द्वारा मानव की कल्पना में बहुत सारा चीज आता है। ऐसे कथाओं के आधार पर किये गये कल्पनाएँ आँखों में आता नहीं। यही मुख्य मुद्दा है। सर्वमानव के साथ यही घटना घटती रहती है। चाहे कितने ही श्रेष्ठ अभ्यासों में परिपक्व क्यों न हुआ हो, चाहे सामान्य व्यक्ति क्यों न हो इस तथ्य का सर्वेक्षण हर व्यक्ति कर सकता है। यही मुख्य बिन्दु है आँखों से अधिक कल्पना होता है। साथ ही कल्पनाएँ आँखों में दिखती नहीं है। यही व्यथा हर मानव के साथ कमोबेशी बना हुआ है ही। इस मुद्दे में मुख्य रूप में जो विषमता का आधार है वह है देखने का परिभाषा। अभी तक आँखों पर जो कुछ भी प्रतिबिम्बित रहती है, दिखने की वस्तु यही है ऐसी ही मान्यता के आधार पर मानव सहज आँखों से अधिक शक्तिशाली यंत्र-उपकरण को बनाकर भी देखा गया। उपकरणों से दूर की चीज अथवा बहुत छोटी चीज को देखा भी है। इन उपकरणों से परमाणुओं एवम् परमाणु अंशों को देखने का दावा भी किये हैं और दूर में स्थित ग्रह-गोलों को, नक्षत्रों को देखने का सत्यापन किये हैं। – आ.व. 188-193

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