(G) केवल शरीर या केवल आत्मा के आधार पर मानव व्याख्यायित नहीं है

उल्लेखनीय तथ्य यह है कि बीसवीं सदी के दसवें दशक में वैज्ञानिक अनुसंधान, शोध, प्रयोग (ह्रास विधि सूत्र, यंत्र प्रमाण की महिमा) के साथ मनुष्य शरीर की कोषाओं से ऐसे मनुष्य शरीर के तैयार होने के कार्यक्रम की परिकल्पना दी गई। यह प्रकृति में, वह भी स्वेदज अवस्था में केंचुआ, जोंक आदि रचनाएं विरचित होकर प्रत्येक मृतक कोषा पुन: उसी प्रकार की रचना के लिए बीज रूप है और इसके साकार होने के प्रमाणों को देखा गया है। जैसे एक जोंक को सुखाकर बुरादा बना लें, उसको किसी नमी के स्थान पर, जैसे मिट्टी के बर्तन में पानी भर दें। पानी की नमी धीरे धीरे बहिर्गत होती रहे। उसे पेंदी से लगा हुआ, जोंक का बुरादा डाल दें, कुछ ही दिनों में बहुत से जोंक देखने को मिलते हैं। इसी प्रकार चमड़े की कोषाएं निष्प्राणित होने के बाद भी, सप्राणित होना प्रमाणित हो जाता है। अभी अत्याधुनिक खर्चीली विधियों से, इसी को दोहराने का उपक्रम किया गया है। इसमें भी मनुष्य शरीर के एक कोषा को, उसमें निहित प्राण सूत्र अथवा रचना सूत्र के आधार पर बहुकोषाओं में प्रवर्तित और रचना सूत्र में स्थापित रचना के रूप में रचित होने के लिए आवश्यकीय रासायनिक द्रव्यों को सुलभ कराने और ऊष्मा व दबाव नियंत्रित कर रखने में, मनुष्य सफल हुआ है। फलस्वरूप कृत्रिम शरीर रचना, एक संभावना के रूप में आ चुकी है। मूलत: यह प्राकृतिक स्वरूप ही है क्योंकि इस कार्य-कलाप में भी किसी शरीर का मूल प्राण कोषाओं का आधार रहता है इसलिए यह भी, प्राकृतिक स्वरूप में भी गण्य हो पाता है। इसका उदाहरण पहले दे चुके हैं।

कृत्रिम शरीर रचना की अस्मिता के सम्बन्ध में मूल मानसिकता को विश्लेषित करने पर पता लगता है कि (1) किसी एक प्रजाति की शरीर रचना को बहु-संख्या में प्राप्त कर लें, इससे बेहतरीन समाज-रचना हो सकती है, इस बात की सूझ-बूझ रंग और नस्ल के आधार पर सोची जा सकती है। सभी रंग और नस्ल भी अभिव्यक्ति की विविधता में और किसी एक ही व्यक्ति में बुहमुखी प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। इसके बावजूद अभिलाषाएं या परिकल्पनाएं कृत्रिम मनुष्य के सृजन के मूल में, एक प्रजाति की कामना का होना संभव है। इसी के साथ अन्य प्रजातियों के शरीर रचना की संख्या को घटाने की भी परिकल्पना हो सकती है। इससे संसार का कोई उपकार होने की संभावना नहीं है, क्योंकि मनुष्य संस्कारनुषंगीय इकाई है, सुख धर्मी है और विज्ञान तथा विवेक पूर्ण विधि से जीने की कला में जागृत होना प्रत्याशित, आशित और संभावित तथ्य है।

प्रकारान्तर से केवल, जीवन के आधार पर अथवा केवल शरीर के आधार पर, मानव परम्परा को व्याख्यायित करने वाले सभी प्रयास पराभवित हो चुके हैं। इस तथ्य को ध्यान में लाना इसलिए आवश्यक है कि मानव परम्परा में ऐसे बहुतायत प्रयास हो चुके हैं। अभी तक किसी भी सार्थक प्रयास से अथवा मान्य सार्थक प्रयासों से, समुदाय-चेतना से मुक्त होना और समाज चेतना से संपृक्त होना संभव नहीं हो पाया। जबकि समुदायों में “श्रेष्ठता’’ सहज रूप में प्राप्त है। बेहतर (श्रेष्ठ) समाज की कल्पना अवश्य ही आती रही है। यह सब समुदाय के रूप में ही सिमटता रहा है। इसका मूल तत्व यह रहा है कि प्रकारान्तर से जीवन कल्पना को परम सत्य मानते हुए, अपने अपने तरीके से आचार संहिता को प्रस्तुत किए। कुछ समुदाय शरीर, मरणशील होने के आधार पर कोई शाश्वत वस्तु जैसे ब्रह्म, ईश्वर नाम और मान्यता के आधार पर आत्मा, रूह आदि नाम दिये। मान्यतायें बनी रहीं। फलत: इस क्रम में कल्पना के आधार पर आचार संहिता को मानते हुए चलते आए हैं। इन दोनों विधियों से जितने भी प्रयास हुए, पूरक विधि निकल नहीं पाई।

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