(मानव में) इच्छाएं अपने आप में रूचि मूलक, मूल्य मूलक व लक्ष्य मूलक प्रणाली से, स्वयं प्रकाशित प्रमाणित होती हैं। इच्छाएं, ईक्षण सहित छवि की महिमा के अर्थ में, मानव के क्रियाकलापों में सार्थक अथवा चरितार्थ होती हैं। -म.वि. 218
न्याय सहज वैभव का द़ृष्टा जीवन ही होता है। जीवनगत चित्त में ही न्याय साक्षात्कार होता है। यह जीवन में होने वाली छठवीं क्रिया चिंतन है। इसके पहले चयन और आस्वादन, विश्लेषण और तुलन क्रियाओं को, प्रत्येक भ्रमित मानव में इन्द्रिय सन्निकर्ष पूर्वक संपन्न होना स्पष्ट किया जा चुका है। चित्त में ही चिंतन और चित्रण कार्य संपन्न होता है।
चिंतन में ही न्याय-धर्म-सत्य रूपी प्रयोजनों को अनुभव रूप में पहचाना जाता है। चिंतन विधि से न्याय के प्रयोजन को मनुष्य पहचानता है, जीवन पहचानता है। फलस्वरुप अखण्ड समाज की कल्पना और परिवार मानव की कल्पना सहज स्पष्ट होता है। फलस्वरुप व्यवहार में प्रमाणित होना आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार चिंतन में प्रयोजनों का पहचान कल्पनाशीलता के संयोग से ही हो पाता है। चिंतन का तात्पर्य अनुभव सहज साक्षात्कार से है। साक्षात्कार का तात्पर्य जो जैसा है उसे वैसा ही जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने से ही है। जो जैसा है उसे जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने का प्रमाण स्वयं व्यवस्था में जीना और समग्र व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करने के रूप में स्पष्ट होता है। - अ.श. 219
जीवन सहज और दो क्रियाएँ बोध और संकल्प के रूप में पहचानी जाती हैं। यह बुद्घि में होने वाला वैभव है। बोध जो कुछ भी होता है न्याय, धर्म, सत्य का ही होता है। न्याय सहज बोध का प्रमाण परिवार मानव के रूप में ही देखने को मिल चुका है। धर्म बोध का तात्पर्य है - सार्वभौम व्यवस्था का बोध होता है। सर्वतोमुखी समाधान को प्रमाणित करने के लिए संकल्पित होना। कल्पनाशीलता = न्याय सहज रूप में सबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह कार्य में पहली राहत, पहला सुख जिसकी निरंतरता की संभावना उदय हो चुकी रहती है। सर्वतोमुखी समाधान के रूप में संपूर्ण कल्पनाशीलता नित्य सुख के रूप में परिणित हो जाता है या जागृत हो जाता है। यही कल्पनाशीलता का तृप्ति बिंदु है।
सर्वतोमुखी समाधान पूर्वक ही व्यवस्था में भागीदारी का प्रमाण व्यवहार में मिल पाता है। यही सुख की निरंतरता की गवाही है। यह भी गवाही है कि व्यवस्था की ही निरंतरता होती है, अव्यवस्था का नहीं। अव्यवस्था का परिवर्तन भावी है क्योंकि अस्तित्व में विकास निश्चित है, इससे व्यवस्था निश्चित है। इसलिए अव्यवस्था का परिवर्तन भावी है, यही नियति है। धर्म बोध सदा सुखद होता है। परम संतोष आनंद सहज प्रतीति बोध में बनी ही रहती है। इसकी सार्थक प्रक्रिया समाधान ही है जो बुद्घि में संकल्प के रूप में वर्तमान रहता है।