पाँचवी दो क्रियाएँ जीवन में अनुभव और प्रामाणिकता के रूप में संपन्न होती हैं। मानव संचेतना सहज तृप्ति, उसकी निरंतरता के रूप में अनुभव प्रमाणित होता है। मानव संचेतना जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने का कार्यकलाप है। इसका तृप्ति बिंदु समाधान है। इसका बोध ही धर्म है। जो परम संतोष और आनंद स्वरुप ऐसे जानने, मानने, पहचानने और निर्वाह करने का तृप्ति बिंदु ही अनुभव की वस्तु है। एक बार किसी एक मुहूर्त में अनुभव गम्य होने के उपरान्त अनुभव मूलक विधि से, जीवन व्यक्त होना पाया जाता है। इसके पहले अनुभव गामी विधि से अर्थात् अज्ञात को ज्ञात करने एवं अप्राप्त को प्राप्त करने के क्रम में जागृति होती है। इसी जागृति क्रम में कल्पनाशीलता कर्म-स्वतंत्रता प्रयोग होते ही रहता आया है। – भ.व. 139-143
3.3 जीवन में जागृतिक्रम: भ्रम, बंधन
(A) भ्रम =आशा-विचार-इच्छा बंधन
(*मानव ने) इंद्रिय सन्निकर्षों के आधार पर, शरीर को जीवन मानते हुए स्वीकार किया। रूचियां, इन्हीं इन्द्रियों द्वारा, रूचि ग्राही होने के रूप में, भ्रमित मन मान लेने से भी, क्षणिक रूप में सुख भासना, देखा गया है। शरीर संवेदनाओं के आधार पर, सम्पूर्ण प्रकार की रूचियों को, भंगुरात्मक (क्षण-भंगुर) ही पाया गया। इनकी स्मृतियों में विवश होते हुए, मानव ने बारम्बार ऐसे प्रयासों में भ्रम में मग्न रहकर, इसे ही सुख का एक मात्र मार्ग है- ऐसा मानते हुए अधिकांश लोगों ने चलकर देख लिया। निष्कर्ष यही निकला कि ऐसी प्रवृत्तियों के आधार पर कोई :-
व्यवस्था सूत्र से सूत्रित नहीं हुआ।
- सार्वभौम समाज न्याय को पहचानना संभव नहीं हुआ।
- सर्व - समृद्धि का कोई मार्ग, प्रशस्त नहीं हो पाया।
- इस प्रकार मानव की अभीप्साएं अभी भी प्रतीक्षा में ही हैं।
भ्रम का कार्य रूप अतिव्याप्ति, अनाव्याप्ति, अव्याप्ति दोष ही है। यही अधिमूल्यन, अवमूल्यन, निर्मूल्यन क्रियाओं के रूप में देखने को मिलता है। इसका मूल रूप बन्धन है।
बन्धन स्वयं में जागृति क्रम है।
उसके पहले जीवनी क्रम है। जीवनी क्रम में जीवों में पाया जाता है। जीवावस्था में भी जीवन रहता है। मूलत: जीवन ही है। जीवन अपने में गठनपूर्ण परमाणु चैतन्य इकाई है। जीवन परमाणु भार और अणुबन्धन से मुक्त रहता है और आशा बन्धन से कार्यप्रणाली आरंभ होता है। जीवन में आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और अनुभव प्रमाण जैसी शक्तियाँ और मन, वृत्ति, चित्त, बुद्घि और आत्मा रूपी बल अविरत रूप में विद्यमान रहता है। बल और शक्ति अविभाज्य रूप में रहते हैं। यह प्रकृति सहज प्रत्येक इकाई में प्रकाशित महिमा है। गठनपूर्ण परमाणु ही जीवन के रूप में कार्य करता हुआ समझ में आता है। गठनपूर्ण होने के पहले सभी परमाणु भौतिक-रासायनिक कार्यकलापों में