पहले इंगित करा ही चुके हैं। इसलिये ‘‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’’ परिचय विधि से ही आवश्यकता को उद्गमित करता है। - आ.व. 42-45

सर्वप्रथम भ्रम और बन्धन का कार्य रूप, परमाणु में अणु बंधन, भार बन्धन से मुक्ति के अनन्तर; भ्रम ही आशा बन्धन रूप में व्यक्त होना जीव संसार में प्रमाणित होता है। चैतन्य पद में प्रतिष्ठित होने पर आशा, विचार का क्रियाशीलता, कम से कम आशा की क्रियाशीलता होना पाया जाता है। इसका प्रमाण रूप जीवन स्वयं अपने कार्य गतिपथ को अपने ही आशानुरूप स्थापित कर लेता है। आशा का मूल सूत्र जीने की आशा ही है। जीने की आशा जीवनगत मन सहज आस्वादनापेक्षा का प्रकाशन है। यही जीवावस्था में स्पष्ट है।

चैतन्य प्रकृति जब तक जीने की आशा से सीमित रहती है तब तक जीवनी क्रम के रूप में ही प्रिय, हित, लाभात्मक दृष्टियों का आंशिक प्रयोग करते हुए जीवनी क्रम (जीवावस्था) के परम्पराओं को बनाये रखने के रूप में साक्षित है। यही भ्रम का प्रथम चरण है। इस चरण में भ्रम की पीड़ा या बन्धन की पीड़ा प्रभावित प्रमाणित नहीं होती है। – आ.व. 128-129

आशा बन्धन के साक्ष्य में जीने की आशा विधि से सुखी होने के उद्देश्य से इन्द्रिय आस्वादन के लिए चार विषयों को लक्ष्य मान लेना बनता है। इसी के साथ जीवन शक्तियों को लगाने में तत्परता ही बन्धन के स्वरूप में होना देखा जाता है। इस स्थिति में किया जाने वाला भोग विधि भ्रम के रूप में गण्य होता है। आशा और विचार बन्धन के रूप में जब जीवन शक्तियाँ कार्यरत होते हैं तमाम तर्क और वाड्मय व्यक्त होना आरंभ होता है। जो जिस वाङ्मयको प्रस्तुत करता है उसे सर्वाधिक सत्य मान लेता है। ऐसे ही भ्रमावस्था में दूसरे विधि से लिखे गये सभी वाङ्मय को अपना विरोधी मान लेता है। जो मूल व्यक्ति वाङ्मय स्थापित किया, जिसके प्रति लोगों की आस्था हो गई यही एक समुदाय और ऐसे अनेक समुदाय इस धरती पर होना देखा गया है। ऐसी परम्पराएँ किताब को प्रमाण माना। ऐसी अनेक आदर्श किताबें स्थापित हुई।

उस-उस परंपरा में उन-उन किताबों का अनुमोदन, समर्थन करने वाले व्यक्ति आदर्श, शिष्ट व्यक्ति के रूप में मानने के लिए लोक मानस तत्पर रही है। इस दशक में भी इस प्रकार की मान्याताओं पर आधारित शिष्टता और आदर्शता देखने को मिल रहा है। यह विविध प्रकार से समुदायगत आस्थाओं के रूप में प्रवाहित होते हुए अभी तक अन्तर्विरोध और परस्पर समुदायों का विरोध समाप्त नहीं हो पाया। ये सभी परम्पराएँ उपदेश व आश्वासनों के बलबूते पर सम्मानित होना देखा जाता है। यह आशा-विचार बन्धन का ही स्वरूप है क्योंकि इन सभी समुदायों में सम्मानित विविध वाङ्मय जो आज इस दशक में प्रस्तुत हैं, सर्वसम्मत समझदारी का निश्चयन नहीं कर पाते हैं। इसका कारण मानव का अध्ययन स्पष्ट नहीं हो पाया, अस्तित्व सहज सत्य सह-अस्तित्व के रूप में स्पष्ट नहीं हो पाया। - आ.व. 140-142

आशा बंधन (* से आवेश)

भ्रान्त अवस्था में प्रधानतः छः प्रकार के संवेगों को पाया जाता है, वे हैं 1. काम, 2. क्रोध, 3. मद, 4. मोह, 5. लोभ और 6. मत्सर।

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