(B) तुलन और विश्लेषण

तुलन में मानव प्रियाप्रिय, हिताहित, लाभालाभात्मक तुलन को हर स्थिति में भ्रमित व्यक्ति करता है। प्रिय-अप्रियता का संपूर्ण तुलन पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के साथ ही सर्वाधिक हो पाता है। स्वयं के साथ भी, दूसरों के साथ भी यही देखने को मिलता है। हिताहित संबंधी तुलन शरीर स्वास्थ्य केन्द्रित विधि से होना पाया जाता है। स्वास्थ्य के लिए उचित अनुचित के आधार पर हिताहित का निर्णय होना स्पष्ट है। जहाँ तक लाभालाभात्मक तुलन का कार्य रूप है कम देना, ज्यादा लेना की इच्छा, विचार, आशा से संबंद्घ रहता है। इसी क्रम में लाभोन्माद तक लाभोन्मादी व्यापारवाद को मानव परंपरा ने अपनाया है।

ऊपर कही गई तीनों द़ृष्टियाँ (तुलन) बिना सही समझदारी के भी अधिकांश व्यक्तियों में क्रियाशील रहती हैं। ऐसी तीनों द़ृष्टियाँ जीवों में भी किसी अंश में क्रियाशील होना, देखने को मिलती हैं।

प्रियाप्रिय: विषय सापेक्ष

  • हिताहित: शरीर सापेक्ष
  • लाभालाभ: वस्तु व सेवा सापेक्ष
  • न्यायान्याय: व्यवहार सापेक्ष
  • धर्माधर्म: समाधान सापेक्ष तथा
  • सत्यासत्य: अस्तित्व सापेक्ष पद्धति से स्पष्ट होता है।(व्य.द. 1978, 28)
  • मौलिक रूप में जागृत मानव में कार्य करने वाली क्रियाशील द़ृष्टियाँ है, वे द़ृष्टियाँ है न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म और सत्य-असत्य। मानव परपंरा में सहज रूप में जागृति और इनकी निरंतरता ही जागृति का मतलब है। संबंधों को पहचानना, मूल्यों को निर्वाह करना तथा मूल्यांकन क्रिया व उभय तृप्ति का होना अपने रूप में न्याय है। इस क्रम में न्याय सबके लिए वांछित रहते हुए परंपरागत विधि से सर्व सुलभ होने की स्थिति तथा प्रमाण, किसी परंपरा में देखने को नहीं मिलता है क्योंकि न्याय संहिता व न्यायालयों में फैसला करते हैं, न्याय नहीं। यह स्वाभाविक रूप में मानववादी चिंतन क्रम में द़ृष्टिगोचर होता है। व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, अतंर्राष्ट्र जैसे परिप्रेक्ष्यों में सामरस्यता आवश्यक हुई। मानव में पाई जाने वाली प्रियाप्रिय, हिताहित, लाभालाभ, न्यायान्याय, धर्माधर्म, सत्यासत्य रुपी द़ृष्टिकोणों में सामरस्यता आवश्यक हुई। परिवार, समाज, राज्य, व्यवस्था प्रामाणिकता सहज निश्चित दिशा में सामरस्यता के प्रति परिशीलन करना, पुनर्विचार करना, संतुलित ध्रुवीकृत विधि से निष्कर्षों को पाना आवश्यक हुआ। इसी आधार पर कल्पना, तर्क, विज्ञान, विवेक, अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था रूपी प्रयोजन के अर्थ में समाधानात्मक भौतिकवाद प्रस्तुत हुआ।

मानव जीवन सहज न्याय-अन्याय, धर्म-अर्धम, सत्य-असत्यात्मक तुलन पूर्वक न्याय, धर्म, सत्य द़ृष्टि से कार्य करने के क्रम में मानवीय आचरण, अखण्ड न्याय सहज वैभव मानव कुल में सार्थक होगा। सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी, धर्म सहज वैभव, सर्वतोमुखी समाधान सहज विधि से सार्थक होगा। जागृति, प्रामाणिकता, स्वानुशासन सत्य सहज वैभव मानव में, से, के लिए सुलभ रहेगा ही। -भ.व. 88

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