कार्यकलाप नहीं हो पाता, इसका प्रमाण कई लोग देख चुके हैं। अस्तु, शरीर सप्राणित रहना भी आवश्यक है। यह तथ्य ऊपर स्पष्ट किए गए विश्लेषण से निश्चित होता है। जीवन्तता, जीवन का ऐश्वर्य है। श्वास लेने-छोड़ने की प्रक्रिया प्राण कोशाओं से रचित शरीर रचना की महिमा है। इस प्रकार जीवन और शरीर के संयुक्त रूप मानव-परम्परा की मानव तथा पूरकता भी स्थापना, सह-अस्तित्व सहज, प्रसवन के रूप में दिखाई पड़ती है। - म.वि. 16,17

(इस ढंग से) जीवन संचेतना ही, शरीर जीवन्त रहने पर्यन्त प्रमाणित रहती है। जीवंतता का स्रोत जीवन ही है। जीवन द्वारा अपनी आशा विचार, इच्छा रूपी अक्षय शक्तियों का प्रभावन कार्य के आधार पर, शरीर को जीवंत बनाए रखना, एक सहज प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के आधार पर ही प्रत्येक मनुष्य, शरीर और जीवन में सह-अस्तित्व प्रतिष्ठा स्थापित होने, क्रियाशील रहने, शरीर यात्रा को सहज सुगम बनाए रखने और जीवन सहज उद्देश्यों को प्रमाणित करने का कार्य देखने को मिलता है। - म.वि. 245

हर जीवन का ही कार्य वैभव और फलन है। इसका सिद्घान्त यही है कि अधिक शक्ति और बल, कम शक्ति और बल सम्पन्न माध्यम के द्वारा प्रकाशित होता है। जीवन अक्षय शक्ति, अक्षय बल सम्पन्न इकाई है। प्राण कोषाओं का शक्ति और बल उसके रचना के आधार पर सीमित रहता ही है। क्योंकि हर रचना का विरचना क्रम जुड़ा ही रहता है। इस आधार पर इस धरती पर जितने भी प्राण कोशाओं की रचना है शीघ्र परिवर्ती है, भौतिक रचनाएँ दीर्घ परिवर्ती हैं। इसीलिये मानव शरीर प्राण कोशाओं से रचित रहने के लिये इसमें परिवर्ती कार्य घटना समीचीन रहता ही है। इस प्रकार शरीर बल और शक्ति अपने व्यवस्था के रूप में प्रमाणित होते हुए सीमित और जड़ कोटि में गण्य होना पाया जाता है। रचना सहज श्रेष्ठता मेधस रचना और मेधस तंत्रणा ही प्रधान है। हृदयतंत्र मेधस तंत्र यही मुख्य तंत्र है। इस प्रकार शरीर में मेधस और मेधस तंत्र हृदय और हृदय तंत्र सह-अस्तित्व में शरीर व्यवस्था कार्य सम्पन्न होना मानव शरीर के लिये रस, रसायन स्रोत, पाचन परिणाम, अनावश्यकता का विसर्जन, ये सब तंत्रणाएँ ऊपर कहे गये दोनों तंत्रों के आधार पर कार्यरत रहना पाया जाता है। इसी को शरीर व्यवस्था का नाम दिया जाता है। शरीर जीवन्त न रहने की स्थिति में स्वतंत्र रूप में आहार आदि क्रियाओं का सम्पादन नहीं हो पाता है और ज्ञानेन्द्रियों का क्रियाकलाप शून्य हो जाता है। ऐसे बहुत सारे उदाहरणों को मानव ने देखा है। इससे यह स्पष्ट होता है-शरीर को जीवन्त बनाए रखने का मूल तत्व जीवन ही है। जीवन ज्ञान के साथ-साथ ही यह तथ्य स्वीकार हो पाता है। तब तक भ्रमित रहना भावी है ही। भ्रम का सबसे चिन्हित गवाही यही है-शरीर को जीवन समझना। शरीर को जीवन समझने के मूल में जीवन सहज कल्पना ही आधार है। यह भ्रमित रहने के कारण ऐसा मानना होता है। फलस्वरूप जीवन अपेक्षा के विपरीत, मानव अपेक्षा के विपरीत घटित होता है यही कारण रहा है जागृति विधि को मानव परंपरा को अपनाने के लिये आवश्यकता बलवती हुई। – आ.व. 201 - 202

Page 85 of 335
81 82 83 84 85 86 87 88 89