‘भ्रम और बन्धन’ की पीड़ा की पराकाष्ठा किसी न किसी को होना आवश्यक था। यह नियतिक्रम में विधिवत घटित हो ही जाता है क्योंकि अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व में परम लक्ष्य स्थिति निश्चित और स्थिर है। क्योंकि अस्तित्व स्थिर है, जागृति निश्चित है। इसे प्रमाणित होने के लिये, करने के लिये सह-अस्तित्व सहज क्रिया, प्रक्रिया, प्रणाली, पद्घतियाँ अस्तित्व और जागृति के मध्य में सुस्पष्ट है। अस्तित्व का होना नित्य वर्तमान के रूप में दृष्टव्य है। सह-अस्तित्व में ही ज्ञानावस्था सहज मानव प्रकृति जड़-चैतन्य के संयुक्त रूप में परम्परा सहज विधि से जागृति सहज प्रमाण होना पाया जाता है।
जीवन में आशा बन्धन के उपरान्त विचार बन्धन, इच्छा बन्धन बलवती होते हुए मानव शरीर द्वारा कर्म स्वतंत्रता, कल्पनाशीलता, क्रियाशीलता, क्रियाकलाप क्रम उसके परिणाम में आंकलन होना, फलत: जागृतिक्रम परंपरा के रूप में मानव प्रतिष्ठा होना, इसी कर्म स्वतंत्रता-कल्पनाशीलता और जागृतिक्रम प्रणालीवश (क्योंकि यह नियति क्रम है) अव्यवस्था का भास-आभास में पीड़ा होना स्वाभाविक रहा। इसी आधार पर जागृत होने की आवश्यकता, सार्वभौम व्यवस्था का शरण स्वीकृत होना देखा गया। यही समग्रता के साथ मानव और समग्र व्यवस्था के अंगभूत रूप में सर्वमानव समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व सम्पन्न होने की सहज विधि समीचीन है। समग्रता के साथ मानव का निरीक्षण, परीक्षण के फलन में यह तथ्य अनुभव संगत विधि से देखने को मिला। - आ.व. 177
अब बंधन से मुक्ति क्रम में समझदारी व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी होना सहज समीचीन है इसलिए आवर्तनशील विधि को जागृतपूर्वक पहचानना संभव हुआ। - आ.व. 32-37
मानव परंपरा जागृति क्रम में इस शताब्दी के अंतिम दशक तक जूझता ही रहा है। अब जागृत परंपरा के रूप में प्रमाणित होने का सहज समीचीनता देखने को मिल रहा है क्योंकि अनुभवमूलक संप्रेषणा सुलभ हो गया है। इसी के प्रमाण में यह ग्रंथ सूचना के रूप में प्रस्तुत है। प्रमाण का स्त्रोत हर जागृत मानव ही है।
यह स्पष्ट हो गया कि बन्धन किसको, क्यों, कैसे होता है? बन्धन में होता कैसा है? भ्रम बन्धन का पीड़ा किस विधि से बलवती होती है। कौन-कैसे भ्रम-बन्धन से मुक्त होता है? इसमें मुख्य बिन्दु जीवन ही जागृतिपूर्वक भ्रम-बन्धन से मुक्त होता है, यह स्पष्ट हो चुका है।
जीवन सहज दस क्रिया क्रियाओं में जिसका विशद् विस्तार स्वरूप 122 आचरणों के रूप में तालिका में स्पष्ट किया जा चुका है। उक्त तालिका के अनुसार जागृत आचरणों के विधिवत अध्ययन के लिए ‘‘मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान’’ के नाम से शास्त्र प्रस्तुत हो चुकी है। यहाँ जीवन के दस क्रिया सहज कार्य विधि से और ये परस्पर प्रेरित, संयोजित कार्य विधि में जागृति का स्वरूप क्रम और बन्धन मुक्ति क्रम को जैसा देखा गया है वैसा ही प्रस्तुत किया गया है।