इस कारण जैसा बन पड़ा, वैसा ही वह मनमानी करते आया। जैसे ही विज्ञान, लोकव्यापीकरण के रूप में विकसित होते आया उसी अनुपात में धरती के साथ अत्याचार बढ़ता ही रहा। मानव का मानव के साथ आदि काल से अत्याचार रहा ही है। उल्लेखनीय बात यही है कि विज्ञान आंरभ होने के उपरान्त ही, इस धरती को सर्वाधिक शोषण करने का कार्य सम्पन्न हुआ।

यह विदित हो चुका है कि परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में भागीदारी करने के क्रम में मानव संचेतना (संवेदनशीलता, संज्ञानशीलता) सहज मानसिकता सार्थक होने के स्थिति-गति के रूप में यह मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान शास्त्र अध्ययन के लिए प्रस्तुत है। इस मानसिकता से ही समाज और व्यवस्था में न्याय संतुलन नियंत्रण सहज प्रमाणित होता है और नैसर्गिक प्राकृतिक क्रियाकलापों के साथ न्याय पूरकता विधि के साथ मानसिकता सहित प्राकृतिक न्याय, नैसर्गिक न्याय निश्चित होना पाया जाता है। इन्हीं निश्चयन के साथ-साथ जनसंख्या नियंत्रण, प्रकृति-प्रदूषण निवारण प्रक्रिया, वन, वन्य पशु और पालतू पशुओं के साथ न्याय, वन खनिज संरक्षण, जल संरक्षण, भूमि संरक्षण प्रवृत्तियां क्रियान्वयन होगी।

युद्ध मुक्ति के साथ-साथ अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार, मिलावट, तनाव ग्रसित मानसिकताओं का निराकरण प्रक्रिया वैभवित होगी। मानव जाति को अखण्ड समाज के रूप में और मानव धर्म को सार्वभौम व्यवस्था के रूप में पहचानना आवश्यक है। इसके पहले जानना मानना अनिवार्य है ही।

मानव परम्परा में, न्याय का लोकव्यापीकरण होने के लिए अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था और मानवीयता पूर्ण आचरण ही प्रमाण है। अस्तु, समाज न्याय व व्यवस्था सुलभ होने के साथ ही नैसर्गिक न्याय सार्थक होता है। इससे पता चलता है कि सर्वतोमुखी समाधान, न्याय, जीवन - जागृति पूर्वक होने वाली सहज सार्थकता है।

25. तादात्मता 26. साहस

तादात्मता :- नित्यता के अर्थ में स्वीकार सहित किया गया निर्णय।

साहस :- सहनशीलता समेत प्रसन्नता सहित किया गया व्यवहार क्रियाकलाप।

वृत्ति में तुलन और विश्लेषण क्रिया निरंतर सम्पन्न होता ही रहता है। यह हर जीवन में जागृति के अनंतर निश्चय के अर्थ में ही सार्थक होना पाया जाता है। निश्चयता का ध्रुव बिन्दु जीवन में वहन क्रिया के रूप में ही होना समझ में आता है। वहन क्रिया क्षमता का द्योतक होता है। वही

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