परम्परा के रूप में है। मानव धर्म और राज्य अविभाज्य है। मानव धर्म (सर्वतोमुखी समाधान) अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में सामरस्यता की निरंतर गति है।

अखंड समाज का कार्य रूप संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह “मानव जाति एक मानव धर्म एक” के आधार पर परस्पर सभी मानवों की परस्परता में संबंध पहचानने में आता है। अस्तित्व में जड़-चैतन्य प्रकृति परस्पर सम्बन्धित है। क्योंकि सहअस्तित्व नित्य प्रभावी है। सहअस्तित्व में अनुभव ही मानव में परम जागृति है। सहअस्तित्व ही परम सत्य है। परम जागृति के अनंतर उसकी निरंतरता वर्तमान होती है। अस्तित्व नित्य वर्तमान है ही। सत्य में अनुभव का प्रमाण ही स्वानुशासन है। स्वानुशासित मानव सहज ही मानवीयता का प्रेरक, दिशा दर्शक होता है। इस प्रकार सत्य-धर्म व्यवहार रूप में चरितार्थ होने की व्यवस्था है। अस्तु मानव ही सत्य धर्म के प्रमाण के रूप में धारक वाहक है।

23. न्याय 24. संवेदना

न्याय :- (1) मानवीयता के पोषण, संवर्धन एवं मूल्यांकन के लिए सम्पादित क्रियाकलाप। (2) संबंधों व मूल्यों की पहचान व निर्वाह तथा मूल्यांकन व उभय तृप्ति क्रिया।

संवेदना :- (1) पूर्णता के अर्थ में वेगित होना। (2) नियम-त्रय सहित किया गया कार्य, व्यवहार, विचार। (3) विकास व जागृति के प्रति वेदना = जिज्ञासा, अपेक्षा, आशा। (4) जाने हुए को मानने के लिए, पहचाने हुए का निर्वाह करने के लिए, स्वयं स्फूर्त जीवन सहज उद्देश्य और प्रक्रिया। (5) सभी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा बाह्य संकेतों को, ग्रहण करने की क्रिया। (6) व्यवस्था के प्रति तत्परता। (7) जागृति सहज विधि से प्रमाणित होने के क्रम में ज्ञानेन्द्रियों को संवेगित (पूर्णता के अर्थ में गतित प्रदान क्रिया) करना, क्रिया के रूप में संप्रेषित होना (दूसरे मानव को समझाने योग्य, इंगित होने योग्य विधि से प्रस्तुत होना)। न्याय, कार्य रूप में संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन, उपलब्धि के रूप में उभय तृप्ति है। न्याय मानव में जीवन सहज जागृति है। जो जानने, मानने, पहचानने-निर्वाह करने में समझदारी है। मानव का समझदारी सहित सफल होना सहज है। समझदारी, जीवन जागृति का प्रमाण है।

न्याय, नियति-क्रम सहज अभिव्यक्ति है। नियति विकास, रचना व जागृति है। इसमें पूरकता का होना, देखा जाता है। परस्परता में पूरकता होती है।

परस्परता का नाम है संबंध।

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