ही, यह अस्तित्व कैसा है? यह समझ में आ गया है। कितना है? - इसका उत्तर मानव की आवश्यकतानुसार मिलता ही रहेगा, यह भी समझ में आया है। इस प्रकार, आवश्यकतानुसार अस्तित्व में सब कुछ समझ में आता है। इसी क्रम में न्याय, धर्म, सत्य मानव कुल सहज अभिव्यक्ति, संप्रेषणा व प्रकाशन है।

न्याय और सौजन्यता ही, पहचानना तथा निर्वाह करने की क्रिया है क्योंकि इसका मूल्यांकन होता है। यह जागृत मानव सहज मानव की अभिव्यक्ति-संप्रेषणा है। इसको जानना, मानना समझदारी का स्वरूप है, यही मानव में जागृति का प्रमाण है।

मानव सहज रूप में, जाने-माने हुए के आधार पर संविधान व निर्वाह करना चाहता है। यह प्रत्येक मानव में पाई जाने वाली कर्म-स्वतंत्रता, कल्पना शीलता की महिमा है। मानव में यह अनुस्यूत क्रिया है। यह मानव सहज मौलिकता में से एक महिमा है। ऐसे वैभव के आधार पर, उसकी तृप्ति के अर्थ में, मनाकार को साकार करने, मनः स्वस्थता का आशावादी होना सहज हुआ है। यह हर मानव में अपेक्षा और जागृत मानव ही प्रमाण है। इस प्रक्रिया के क्रम में, मानव को तृप्ति और उसकी निरंतरता के लिए, उन्मुख करना सहज रहा। फलस्वरूप चिंतन और मानसिक क्रियाओं को हमने अपनाया व प्रयोग प्रक्रिया को अपनाते आया। इस वर्तमान में मेरा भी प्रयास चल रहा है।

यह निश्चित है कि जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण में पारंगत होने के उपरान्त ही मानव का न्याय के प्रति जागृत होता है। जीवन का सहज ऐश्वर्य ही जागृति होने के कारण नैसर्गिक न्याय, समाज-न्याय, व्यवस्था न्याय, मानवीयता पूर्ण आचरण के रूप में समझ में आता है। नैसर्गिक-न्याय अपने में, धरती और धरती के वातावरण को नियमित, नियंत्रित और संतुलित रहने देकर, जीने की कला के रूप में है।

यह धरती विकास क्रम में, नियम पूर्वक संतुलित रहने की स्थिति में, मानव का अवतरण इस धरती पर हुआ। मानव इस धरती पर रहने योग्य रहा ही तभी परम्परा पनप पाई। मानव-परम्परा, बहु संख्या में फैल तो गई, किन्तु धरती के साथ मानव ने, जो कुछ अभी तक किया है, उससे धरती का संतुलन बिगाड़ने का सर्वाधिक काम किया। यह धरती सीमित है। इस धरती की सम्पदा भी सीमित है। इसका संतुलन, इसमें विकसित सभी धातु, उपधातु, रस-उपरस रूपी खनिज और वनस्पतियों का अनुपात ही, इसके नियंत्रण को बनाए रखता है। आदि काल से धरती पर मानव निवास कर रहा है, उसे इस धरती के नियंत्रण के लिए अनुपातीय ज्ञान न रहा,

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