के साथ मिसाल के साथ हमें यह बोध होता है और बोधपूर्वक तुलन, विश्लेषण सहज निर्णयों के रूप में तादात्मता और साहसिकता की जीवन सार्थकता और मानव सार्थकता के अर्थ में स्पष्ट और प्रमाणित कर देना बनता है।

27. संयम 28. नियम

संयम :- मानवीयतापूर्ण विचार, व्यवहार एवं व्यवसाय में नियंत्रित होना।

नियम :- नियंत्रणपूर्वक स्वयं स्फूर्त विधि से व्यवस्था में जीते हुए समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने की प्रवृत्ति और प्रमाण।

संयम, नियम, नियंत्रण, सन्तुलन और जागृतिपूर्वक दायित्व और कर्तव्य निर्वाह होना पाया जाता है। इन प्रक्रियाओं को नियम के नाम से जाना जाता है। नियम मानव सहज रूप में दायित्वों के प्रति होने वाली उदात्तीकरण स्वयं स्फूर्त संप्रेषणा, प्रकाशन कार्य व्यवहार है। ऐसे संयम व नियम व्यवहार-कार्यों व्यवस्था के अर्थ में सार्थक होना सहज है। जबकि अक्षय बल व अक्षय शक्ति सहज जागृति की अभिव्यक्तियाँ हैं। मानव सहज बहुमुखी अभिव्यक्ति वृत्तियों-प्रवृत्तियों का होना पाया जाता है। इसी क्रम में जागृति पूर्ण प्रक्रिया, पद्धति, प्रणाली और नीति को पहचानना सहज है यही अध्ययन की सार्थकता है।

मानव अपनी सार्थकता के क्रम में संयम और नियमपूर्वक अपने आचरण, व्यवहार, व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी से प्रमाणित होता है। अध्ययन, अभ्यास व अनुसंधान कार्यों से जागृत होने का प्रमाण प्रकाशित, संप्रेषित तथा अभिव्यक्त होता है। समझदारी पूर्वक इन तथ्यों को प्रकाशित करते समय सहज रूप में ही सयंमता व नियम स्वयं स्फूर्त रूप में प्रकाशित होता है। यह शुभ, सुन्दर, समाधान सहज स्फुरण है। प्रत्येक मानव शुभ, सुन्दर, समाधान सहज सहअस्तित्व को अनुभव करना चाहता है। ऐसी अनुभूति के लिए अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चितंन अध्ययनार्थ प्रस्तुत है जिसके लिए हर मानव प्रतीक्षारत है। ऐसी अनुभूति ही सुख, शान्ति, संतोष और आनंद का स्वरूप है।

मानवीयतापूर्ण आचरण मूल्य, चरित्र, नैतिकता का संयुक्त रूप है। जागृत मानव सहज अभिव्यक्ति में जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य है। उपयोगिता मूल्य, कला मूल्य प्राकृतिक ऐश्वर्य पर निपुणता कुशलता पूर्ण श्रम नियोजन पूर्वक उपयोगिता मूल्य और कला मूल्य मूल्यांकित होता है। मूल्यों के आधार पर ही मानव लक्ष्य निर्धारित होता है। मानव

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