प्रकाशन और संप्रेषण क्रिया योग्यता के अर्थ में होना पाया गया। प्रकाशन, सम्पूर्णता के अर्थ में जाना माना जाता है। इस प्रकार जागृत जीवन में जो वैभव निरंतर निहित रहता ही है उसी में से एक आयाम अथवा कोण का स्वरूप तादात्मता और साहस के रूप में पहचान होता है। तादात्मता में जागृत मानव का कार्यरूप इस प्रकार से स्पष्ट होता है कि स्वयं में, से, के लिए नित्यता स्वीकार रहता ही है क्योंकि जीवन नित्यवस्तु है। नित्यवस्तु का तात्पर्य परिणाम से मुक्त वस्तु है।

इस प्रकार जिनके साथ हम कार्य व्यवहार सहअस्तित्व विधि से सार्थक रूप देते हैं इसी क्रम में तादात्मता स्पष्ट होती है। तादात्मता का मुख्य रूप एकता समानता के ध्रुवों पर नियत रहता है। तादात्मता एकता का द्योतक होता है। एकता का ध्रुव जीवन में अपने स्वरूप में एक गठनपूर्ण परमाणु के रूप में नित्यता को प्रकाशित किए रहता है। जीवन शक्ति और बलों में समानता की स्वीकृति लक्ष्य में समानता की स्वीकृति, कार्यरूप में देखने को मिलता है तभी तादात्मता का वैभव मानव परम्परा में स्पष्ट होता है।

तादात्मता का प्रमाण परस्पर मानव में ही स्पष्ट होती है। इसका तात्पर्य यही हुआ परस्पर मानव एकरूपता स्वीकृति सहित कार्य व्यवहारों को निश्चय कर पाना जागृति की महिमा होता है। तादात्मता और उसकी चरितार्थता के रूप में पहचान में आने वाले साहसिकता सहित हर निश्चय कार्य व्यवहार विचार समान सूत्रों से सूत्रित व्याख्यायित रहता है। सहअस्तित्व में जीने में क्रम में मानव सहज परस्परता में जीवन सहज एकरूपता ही तादात्मता का आधार है। शरीर, मानव में जीवन के साथ अविभाज्य रहते हुए तादात्मता का आधार नहीं बन पातीं क्योंकि बदलता हुआ शरीर, कार्य परस्परता तादात्मता का कोई आधार नहीं बनता। इसके साथ यह भी देखा गया है कि हर मानव तादात्मता सहित जीना चाहता है। जीवन के सभी, आयाम, कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्य जागृति सहज प्रकाशन में नित्य तृप्ति समाधान सम्पन्नता प्रमाणित होती है।

वहन क्रिया में सहनशीलता प्रमाणित रहता ही है। जीवन अपने जागृति को प्रमाणित करने के क्रम में सहनशीलता को सुख, शांति, संतोष, आनन्दपूर्वक स्पष्ट करने के क्रम में सम्पूर्ण विचार सहित किया गया कार्य व्यवहार साक्ष्य रूप में स्पष्ट हो जाता है।

मानव का अध्ययन में यह स्पष्ट होता है कि कुछ भी कायिक, वाचिक, मानसिक रूप में करता है वह प्रसन्नतापूर्वक सार्थक होता हुआ देखने मिलता है। हर भ्रमित मानव भी प्रसन्नता के चाहत में ही होना पाया जाता है। प्रसन्नता में न्याय संगत, समाधान और समृद्धि संगत का द्योतक है।

Page 124 of 205