मानव परम्परा में प्रसन्नता का आधार इन्हीं तीन तथ्य आधार बिन्दुओं के रूप में अध्ययनगम्य होता है। इनमें से समाधान और न्याय, जीवन सहज प्रसन्नता, सुख, शांति, संतोष के रूप में और समृद्धि, शरीर पोषण-संरक्षण समाज गति के अर्थ में सार्थक होता हुआ समझ में आता है।
जो जिस को समझ में आया रहता है उसे वह प्रमाणित करने के क्रम में ही होता है। समझ में आने का सारा स्रोत सहअस्तित्व ही है। सहअस्तित्व में ही जीवन भी अविभाज्य वर्तमान है। सहअस्तित्व में नित्य समाधान, नित्य संबंध, निरंतर न्याय मानव कुल में, से, के लिए समीचीन रहता ही है। इसे सार्थक रूप देते ही रहना साहसिकता का तात्पर्य है। साहसिकता के साथ उत्साह बना रहता है जो दिशा सहित गति को प्रशस्त किया रहता है।
हर मानव सुखी होने के अर्थ में ही सहअस्तित्व में तादात्मता और साहस को प्रमाणित करता है। सत्य, नित्य शाश्वत वर्तमान होने के आधार पर ही जीवन जागृति और मानव जागृतिपूर्वक प्रमाणित होने की आवश्यकता सतत समीचीन है। मानव अपने सम्पूर्ण आचरण को आवश्यकता के आधार पर ही गतिशील बनाए रखता है। मानव का सम्पूर्ण दिशा, कोण, आयाम, परिप्रेक्ष्य, देशकाल, अभिव्यक्ति, संप्रेषणा प्रकाशन मानव लक्ष्य और जीवन लक्ष्य के अर्थ में ही स्पष्ट होना पाया जाता है।
यह जागृति सहअस्तित्व में अनुभव का वैभव है। अनुभव मूलक विधि से ही जीवन सहज सम्पूर्ण क्रियाकलाप लक्ष्य की आपूर्ति के लिए सम्पूर्ण कार्य विन्यास विचार किया जाना पाया जाता है। इस विधि से सम्पूर्ण कार्य व्यवहार, विचारों का मूल्यांकन होना सहज है। परस्परता में मूल्यांकन निरंतर सम्पन्न होने वाली प्रक्रिया है। मानव प्रवृत्तियां विचारों के रूप में, साक्षात्कार के रूप में बोध के रूप में और आशा योजना के रूप में कार्य व्यवहार का रूप धारण करता है। यह परस्परता में सम्पन्न होना पाया जाता है।
परस्परता में स्वीकृति, तृप्ति एवं मूल्यांकन की परिणामों में अपेक्षा है। ये अपेक्षाएँ सार्थक होने के क्रम में परिवार संबंध, समाज संबंध, व्यवस्था संबंध, सार्थक रूप में गतिशील होना सहज है। कुंठा, परस्परता में मूल्यांकन सहित स्वीकृति, प्रसन्नता, तृप्ति की न्यूनता का द्योतक है।
इसकी आपूर्ति जीवन जागृति के अनंतर, निरंतर वैभव के रूप में सार्थक होता ही रहता है। इसको इसी स्वरूप में देखा जा सकता है। एक बार मानव अपने सही कार्य व्यवहारों में प्रमाणित हो जाता है वही उसका आगामी कार्ययोजनाओं का आधार बन जाता है। इन्हीं सहज प्रमाणों