ऐसी परस्पता को नियम, नियंत्रण, संतुलन और जागृत विधियों में, समझा जाता है। नियम नियंत्रण-विधि, जड़ प्रकृति में अध्ययनगम्य है। क्योंकि प्रत्येक एक अपने “त्व” सहित व्यवस्था के रूप में व्यक्त है। जीवावस्था ने संतुलन और प्राणावस्था ने नियंत्रण को स्पष्ट किया है। ज्ञानावस्था का मानव, जागृति पूर्वक ही नियम, नियंत्रण, संतुलन पूर्वक जानने-मानने, पहचानने व निर्वाह करने की साक्षियों सहित, न्याय, धर्म, सत्य सहजता को प्रमाणित करता है। प्रत्येक मानव का प्रत्येक प्रमाण, मानव परम्परा के लिए प्रेरक होता है। इस प्रकार जागृति पूर्वक मानव, प्रामाणिकता प्रेरकता को प्रमाणित कर पाता है।
मानव परम्परा में, प्रमाणों की अभिव्यक्ति ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के रूप में व्याख्यायित हो जाती है। अनुभव के आधार पर ही, प्रमाण व प्रामाणिकता, मानव परम्परा के लिए, सहज समीचीन है। अनुभव सत्य में, से, के लिए होता है। सहअस्तित्व ही परम सत्य है और जीवन जागृति पूर्वक मानव में सत्य का अनुभव होना पाया जाता है। जागृति का साक्ष्य जानने-मानने, पहचानने व निर्वाह करने के रूप में अभिव्यक्त, संप्रेषित व प्रकाशित होता है। ऐसी प्रकाशमानता, सहज ही, संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, स्वयं में व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में ही होती है। यही संवेदना (सौजन्यता) का अर्थ है। संवेदना (सौजन्यता) अपने में न्याय का प्रकाशन और संप्रेषणा है।
न्याय, प्रत्येक व्यक्ति के लिए जीवन सहज रूप में अपेक्षित शुभकारी वर्तमान है। वर्तमान का तात्पर्य, स्थिति-गति की निरंतरता है। सहअस्तित्व, अपने में, स्थिति-गति सहित वैभवित है। उसकी निरंतरता ही वर्तमान है। अस्तित्व स्वयं सत्ता में संपृक्त प्रकृति है। इसका, सहअस्तित्व रूप में होना, वर्तमान सहज है। सहअस्तित्व ही, स्थिति व गति के रूप में देखने और समझने को मिलता है। सत्ता, अर्थात् साम्य रूप में स्थित ऊर्जा में सम्पूर्ण प्रकृति अर्थात् सम्पूर्ण इकाईयाँ संपृक्त हैं। संपृक्त होने के फलस्वरूप अविभाज्यता व सहअस्तित्व प्रमाणित है। सत्ता, अपने स्वरूप में व्यापक-साम्य है, यह समझ में आता है। “व्यापक” - इस नामकरण का तात्पर्य यह है कि - “सत्ता कहां तक फैली है ? इसका अंत कहां है ? - इसका पता नहीं लगता। सत्ता में प्रत्येक एक का, स्थिति-गति में होना, देखने को मिलता है। इस प्रकार सत्ता, व्यापक रूप में, स्थिति पूर्ण है, तथा इसकी निरंतरता है। सत्ता में संपृक्त प्रकृति, स्थिति और गति के, अविभाज्य रूप में संपूर्णता व पूर्णता के अर्थ में स्थितिशील है। ऐसी प्रकृति इस धरती में चार अवस्थाओं में स्पष्ट हो चुकी है। चौथे पद में जागृत मानव, दृष्टा पद को पा चुका है। द्रष्टा पद के आधार पर