शरीर की जीवंतता और मानसिकता का मूल रूप जीवन और उसकी महिमा है। जागृत जीवन ही तन, मन और धन का दृष्टा, कर्ता और भोक्ता है। इस प्रकार मानव से संपन्न होने वाली सभी क्रियाएँ फल परिणाम जीवन मूलक अभिव्यक्ति, संप्रेषणा और प्रकाशन है। इस प्रकार मानसिकता पर आधारित तन, मन, धन के अनुरूप कार्यकलाप व उसके अनुसार परणितियाँ होना सहज है। इस प्रकार मानवीयता है। स्वयं मानसिकता का सदुपयोग निर्दिष्ट रूप में स्वयं व्यवस्था तथा समग्र व्यवस्था में भागीदारी है।

मानव में सहज प्रक्रिया है कि मानव मानव के साथ व्यवहार करता है। मनुष्येतर प्रकृति के साथ मानव श्रम नियोजन पूर्वक उत्पादन करता है। मनुष्येतर प्रकृति के साथ श्रम नियोजन पूर्वक उपयोगिता व कला मूल्य को स्थापित करना ही उत्पादन है। उत्पादन क्रम में नैसर्गिकता के सहज संतुलन को बनाए रखना जागृति का प्रमाण है। जीवन शक्तियों का आवश्यकता के अनुसार प्रवर्तन और परावर्तन होता है। एक से अधिक मानवों के साथ जीने के क्रम में शरीर पोषण संरक्षण के आधार पर उत्पादन व निर्माण कार्य करना एक आवश्यकता रही है।

परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था का स्वरूप एक समझदार परिवार से सम्पूर्ण परिवार मिलकर विश्व परिवार का रूप है। प्रत्येक मानव सम्पूर्ण मानवों से सम्बन्धित है। प्रत्येक एक अनंत के साथ सम्मिलित है। अस्तित्व में सब, सबसे सम्बन्धित है। इन्हीं संबंधों को पहचानना और मूल्यों का निर्वाह करना ही सामाजिकता है। विश्व परिवार व्यवस्था ही अखंड समाज है। विश्व परिवार व्यवस्था ही सार्वभौम व्यवस्था है। मानव सुखधर्मी है परिवार की परिभाषा यह है कि परिवार के सभी सदस्य परस्पर परिवार गत उत्पादन-कार्य में परस्पर पूरक हैं। संबंधों को पहचानना, मूल्यों का निर्वाह करना यही विश्व परिवार की भी परिभाषा है। परिवार में व्यवस्था का प्रमाण वर्तमान होता है।

मूलतः मानव जागृति पूर्वक अपने मानवत्व सहित स्वयं से व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है। व्यवस्था के प्रकाशन, संप्रेषणा और अभिव्यक्ति का प्रमाण मानव की परस्परता में है। अस्तित्व ही सत्ता में संपृक्त प्रकृति के रूप में सामरस्य पूर्ण नित्य व्यवस्था है। नियमित, नियंत्रित, संतुलित, जागृति सहज ही व्यवस्था का प्रमाण है। यही स्वभावगति का स्वरूप है।

इस प्रकार पदार्थ अवस्था का नियमित रहना ही उसकी स्वभाव गति है। प्राण अवस्था का नियमित, नियंत्रित रहना ही उसकी स्वभाव गति है। जीवावस्था के सम्पूर्ण जीवों का नियमित, नियंत्रित व संतुलित रहना उनकी स्वभाव गति है। ज्ञानावस्था के मानव का नियमित, नियंत्रित,

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