संतुलित व जागृत रहना ही मानव की स्वभाव गति है। इस प्रकार मानव का अपने में संयम व नियम को प्रमाणित करना जागृति पूर्वक सहज है। जागृति का तात्पर्य न्याय, धर्म, सत्य को प्रमाणित करना ही है। इसकी आवश्यकता है ही।

जागृत मानव व्यवसाय में नियमित रहता है, आचरण में नियंत्रित रहता है, विचारो में संतुलित व समाधानित रहता है, अनुभव में जागृत रहता है। व्यवहार में प्रमाणित रहता है। समग्र व्यवस्था में भागीदार रहता है तथा स्वानुशासन के रूप में जागृति का सम्पूर्ण प्रमाण स्पष्ट होता है। इसे सर्व सुलभ करना ही मानवीयता पूर्ण कार्य-क्रम है।

29. वीरता 30. धीरता

वीरता :- (1) अन्य को न्याय दिलाने की क्रिया में स्व शक्तियों का नियोजन। (2) दूसरों को न्याय उपलब्ध कराने में अपनी भौतिक एवं बौद्धिक शक्तियों का नियोजन करना।

धीरता :- न्याय के प्रति निष्ठा एवं दृढ़ता।

वीरता अपने में न्यायपूर्ण आचरण, व्यवहार, व्यवस्था व व्यवस्था में भागीदारी उसकी निरंतरता है, साथ ही न्याय के लोकव्यापीकरण करने में सक्रियता है। लोक न्याय का आधार मानवीयता है। मानव जन्म से ही न्याय का याचक है। न्याय का याचक होने का तात्पर्य दूसरों से सतत ही न्याय की अपेक्षा है। स्वयं को सुरक्षित रखने के रूप में और पोषण सहज रूप में (अथवा पोषण सहज सुलभ होने की अपेक्षा के रूप में) प्रत्येक मानव में न्याय याचना अध्ययनगम्य है। विशेषकर परम्परा से इसकी अपेक्षा प्रत्येक मानव संतान में होना पाया जाता है। धीरता, वीरता का महत्व और आवश्यकता परिभाषा के अनुसार स्पष्ट हो चुकी है। इसमें जीवन जागृति पूर्वक न्याय को सम्बंधों में पहचानने- निर्वाह करने, मूल्यांकन करने, और मानव अपनी परस्परता में उभय तृप्ति सहज अनुभव करने, नैसर्गिक सम्बंधों में मूल्यांकनपूर्वक नैसर्गिकता में नियम, नियंत्रण, संतुलन को अनुभव करने और स्वयं में तृप्ति पाने का कार्यक्रम है।

मानव मनोविज्ञान अपने में मानव संचेतना के अर्थ में सार्थक है। संचेतना में ही संज्ञानशीलता मानव में, से, के लिए मौलिक अधिकार अभिव्यक्ति स्वत्व स्वतंत्रता के रूप में जानना-मानना, पहचाना-निर्वाह करना जागृति है। फलस्वरूप यही व्यवहार के लिए आवश्यक और उत्तम प्रवृत्ति के रूप में, वृत्ति के रूप में प्रमाणों के रूप में पहचाना गया। हम अपने में तृप्त होने के उपरान्त ही समग्र मानव तृप्ति को स्रोत के रूप में मूल्यांकित करते हैं। फलस्वरूप इसे अभिव्यक्त

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