संप्रेषित करने के लिए उद्देश्य बना। हम यह भी अनुभव कर चुके है कि हर नर-नारी, शिशु, बाल, कौमार्य युवा और प्रौढ़ अवस्थाओं को गुजरता हुआ वृद्धावस्था तक पहुंचता है। यह सब शरीरगत रचना और परिणामों के आधार पर नाम है। शरीर रचना प्राण कोशाओं से रचित होते हैं। यह मूल रूप में गर्भाशय में भ्रूण अवस्था से आरंभ होकर सम्पन्न होना सर्वविदित तथ्य है अथवा विदित होने योग्य तथ्य है। ऐसे शरीर में ही मेधस तंत्र सहित अंग अवयव और तंत्रों सहित मानव शरीर रचना उसकी संपूर्णता को पहचाना गया। ऐसी समृद्धिपूर्ण मेधस सम्पन्न शरीर को जीवन द्वारा संचालित करने के तथ्य को बारम्बार स्मरण में ला चुके है। इस प्रकार प्रत्येक नर-नारी जीवन और शरीर का संयुक्त रूप में होना स्पष्ट है हमें विदित है। सर्वविदित होने की आवश्यकता भी है।
मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान जीवन और जीवन कार्य; जीवन प्रवृत्ति; जीवन विचार, जीवन सहज विधि से होने वाले विश्लेषण, उसमे संज्ञानशीलता विधि उसका मानव प्रयोजन; जीवन प्रयोजन को स्पष्ट करना प्रधान लक्ष्य है। मानव प्रयोजन के रूप में यह पहचाना गया है कि मानव अपने मौलिक रूप में नियम, नियंत्रण, संतुलन, न्याय,धर्म, सत्य सहज संप्रेषणा, अभिव्यक्ति, प्रकाशन है। यह जीवन शरीर संयोगपूर्वक मानव परम्परा में ही मूल्यांकित है। इसकी आवश्यकता उपयोग सदुपयोग को सम्बंधों में पहचाना गया है। सम्बंधों को मानव संबंध, प्राकृतिक (नैसर्गिक) संबंध के रूप में पहचाना गया है। इनमें इन तथ्यों का उपयोग, सदुपयोग पहचाना गया।
फलस्वरूप नैसर्गिक सम्बंधों में संतुलन, असंतुलन बनाये रखने के सर्वाधिक कारक तत्व के रूप में पहचाना गया इसलिए नैसर्गिक संतुलनकारी समझ, शरीर और जीवन संतुलनकारी समझ, परिवार संतुलनकारी समझ, अखंड समाज संतुलनकारी समझ, सार्वभौम व्यवस्था संतुलनकारी समझ, धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, करुणा सहज समझदारी पूर्वक निर्वाह होना पहचाना गया। इस सभी क्रियाकलाप का मूल तत्व जागृति पूर्ण समझदारी होना अनुभव में आया। इन पाँच संतुलन बिन्दुओं को बताया गया है इसमें से शरीर और जीवन संतुलन एक मानव के रूप में पहचानने की आवश्यकता है। ‘मानव’ शब्द में नर-नारी समाहित रहते ही हैं। इतना ही नहीं सभी आयु वर्ग में भी निर्देशित होते हैं।
उक्त विभिन्न आयु वर्ग को इंगित होने वाले क्रम में युवावस्था की प्रवृत्ति, स्वयं स्फूर्त निश्चयन उसकी गति के साथ पाया जाता है। शरीर की अवस्था से अधिक महत्वपूर्ण पहचान यही है कि