स्वयं स्फूर्त विधि से मानव हर आयाम,कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्यों में अपने प्रवर्तन लक्ष्य कार्य विधि और प्रक्रिया को प्रमाणित करने के लिए तत्पर। इसे हर साथी, सहयोगी, मित्र, बंधु, परिवार में पहचानना स्वाभाविक है। पहचानने में सर्वाधिक भाग मूल्यांकन के रूप में है। मूल्यांकन में सर्वाधिक भाग संतुलन-असंतुलन के रूप में ही है।
ऐसे संतुलन-असंतुलन का मूल्यांकन सार्वभौम लक्ष्य अथवा और किसी लक्ष्य के आधार पर जो सार्वभौमता से वंचित है के आधार पर होना पाया जाता है। जो सार्वभौम लक्ष्य नहीं है इस प्रवृत्ति प्रक्रिया को असंतुलन के रूप में हर जागृत मानव पहचानता है। सार्वभौम लक्ष्य की ओर वृत्ति, प्रवर्तन कार्य प्रणाली को संतुलन के रूप में पहचानना सहज है। यह जागृत मानव और भ्रमित मानव दोनों को समझ में आता है। इन सभी क्रियाकलापों का मूल जीवन जागृति है। जीवन में ही मानसिकता का होना स्वाभाविक है। मानसिकता पूर्वक ही हर आयु वर्ग में स्थित नर-नारियों में प्रवृत्ति, कार्य और अपेक्षाएँ सर्वेक्षित मूल्यांकित हो पाती है।
जागृत जीवन सहित हर मानव शरीर और जीवन में संतुलन को प्रमाणित करता ही है। जागृति सहज विधि से ही जानना- मानना, पहचानना,निश्चय करना और निर्वाह करना बन पाता है। हर नर-नारी के लिए वांछित जीवन जागृति का स्रोत मानव पंरपरा ही है। मानव परम्परा ही बहु आयाम विधि से कार्यरत रहना देखने को मिल रहा है। इन सभी आयामों में जागृति संतुलन प्रमाणित होना मानव में, से, के लिए नियति सहज विधि है। नियति सहज विधि का तात्पर्य सहअस्तित्व सहज विधि है। यही सम्पूर्ण स्थिति-गति का सूत्र है।
इस घरती पर मानव की स्थिति अस्तित्व सहज सहअस्तित्व क्रम में अवस्थित रहना स्पष्ट किया जा चुका है। दूसरी विधि से यह स्मरण में रहना आवश्यक है तभी जीवन सहज मनोविज्ञान को जागृति, प्रामाणिकता, प्रयोजनों के अर्थ में समझना सार्थक होता है। इसमें जीवन जागृत होना ही सर्वोपरि पहचान है। ऐसी जागृत मानसिकता के अर्थ में ही मानव संचेतना कार्य विधि और प्रयोजनों को स्पष्ट किया जाना इस मनोविज्ञान शास्त्र की अभिव्यक्ति में निहित है। शास्त्र का तात्पर्य भी यही है कि समझ, विचार, कार्य, व्यवहार, फल-परिणाम पुनः समझ के अनुरूप तृप्तिदायी, तृप्तिकारी और इसकी निरन्तरता होना यह स्वानुशासन स्वतंत्रतापूर्वक प्रमाणित होता है।
मानव अपने अधिकारपूर्ण यथा स्थिति को जीवन जागृति और समझदारी के आधार पर अनुभव करना है। यही मनोविज्ञान की अभिलाषा है। समझदारी के क्रम में ही हम प्रकारान्तर से अस्तित्व,