ऐसे परिवार संतुलन के साथ ही नैसर्गिक संतुलन की योजना कार्य समाहित रहता है और समझदार सभी मानव परिवार के साथ संबंध निर्वाह लक्ष्य के संदर्भ में हो पाता है। इस धरती के सभी परिवार समझदार होने की स्थिति में विश्व मानव परिवार होने की संज्ञा पाते हैं। परस्पर हर परिवार एक दूसरे के पूरक होना सार्थकता के अर्थ में मूल्यांकित होता है। मानव सहज सार्थकता अथवा सार्वभौम लक्ष्य, समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व ही अतएव सम्पूर्ण कार्य योजना, विचार, विधि उसके मूल में समझदारी ये सब एक दूसरे के पूरक और संतुलनकारी होना पाया जाता है। इस मनोविज्ञान शास्त्र का उद्देश्य भी यही है। हर मानव परिवार समझदार होना ही है, होंगे ही।

इसका आधार है कि हर मानव समझदार होना चाहता है। तभी समाज और व्यवस्था के संतुलन को प्रमाणित करना बनता है। जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयतापूर्ण आचरण सहज हर जागृत मानव अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में संतुलन को पहचान सकते है। इसी तथ्य वश इस मनोविज्ञान शास्त्र का अभिव्यक्ति, संप्रेषणा प्रस्तुत है।

अखंड समाज में संतुलन का स्वरूप जागृति पूर्वक जागृति विधि से समझ में आता है कि सम्पूर्ण परिवार में कार्यरत प्रत्येक मानव मानवीयता पूर्वक मानव प्रतिष्ठा संपन्न है। मानव प्रतिष्ठा में परस्पर परिवार और परिवार में कार्यरत प्रत्येक इकाई का संबंध पहचानने में आता है। यही जागृति है। पुनः इस प्रत्येक मानव मानवीयता पूर्ण प्रतिष्ठा से सहज वैभव है इसे स्वीकारना, पहचानना तदनुसार सम्बंधों को निश्चय करना, व्यवस्था और प्रयोजन सूत्र से सूत्रित रहना और इसे प्रयोग करना ही पूरकता विधि है। हर जागृत मानव अपने को पूरकता विधि से ही प्रस्तुत करता है। अतएव अखंड समाज सूत्र मानवत्व के रूप में सार्थक होना हर भ्रमित व्यक्ति को कल्पना में आता है जागृत व्यक्ति को समझ में आया रहता है।

समझदार व्यक्ति, समझदार व्यक्ति के साथ पूरक होना परिवार में चिन्हित हो जाता है प्रमाणित होता है। फलस्वरूप समाधान समृद्धि हर जागृत परिवार में प्रमाणित होता ही है। ऐसे परिवार में हर व्यक्ति उपकार अर्थात् उपाय पूर्वक उत्थान (जागृति और विकास के अर्थ में किया गया तन, मन, धन रूपी अर्थ का प्रयोग उपयोग) से है। जागृति पूर्वक अर्थ का सदुपयोग होना प्रयोजनशील होना, प्रमाणित होता है। इसी तथ्यवश समझदार परिवार में भागीदारी करने वाले उपकार कार्य में प्रवृत और कार्यरत होते है। यह समाधान समृद्धि का वैभव रूपी प्रमाण है। वैभव का तात्पर्य स्वीकारने योग्य प्रयोजन, आचरण और समझदारी से है। इस प्रकार उपकार करने वाले होने

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