वाले का योग संगीत अर्थात् सार्थकता के अर्थ में उभय स्वीकृति के रूप में सम्पन्न होना पाया जाता है। इस प्रकार प्रयोजनशील सार्थकवादी उपकार कार्यक्रम शिक्षा-संस्कार के रूप में ही सार्थक होना पाया जाता है। हर मानव समझदारी से संपन्न होने के उपरांत ही स्वायत्त सम्पन्न हैं। ऐसी स्वायत्तता को छः प्रकार से पहचाना गया प्रमाणों के रूप में विदित कराया जा चुका है। ऐसे समझदार मानव की पहचान पहले समझाये गये छः समाधान सहज गति के रूप में होने के आधार पर ही हर आयाम दिशा कोण के परिपेक्ष्यो में लिया गया निर्णय समाधानकारी होना स्वाभाविक है। स्वाभाविक का तात्पर्य व्यक्ति जो समझदार हुआ रहता है उनमें समाधानकारी,न्यायकारी, प्रयोजनकारी निर्णय बिना दूसरे के सहायता के सम्पन्न होता है। फलतः उपकारकारी होता है। इस प्रकार समझदार परिवार में भागीदारी करने वाले सभी नर नारी उपकारकारी कार्य में प्रवर्तित होते हैं। उपकार कार्य में तीन स्वरूप को पहचाना गया, वह है- समझा हुआ को समझाना, किया हुआ को कराना, सीखा हुआ को सिखाना ही है। सीखा हुआ क्रिया के मूल में समझदारी ही सबल सार्थक प्रवर्तन है। मानव का प्रवर्तन सहअस्तित्ववादी विचार शैली के आधार पर सार्थक होना पाया गया। फलस्वरूप समझकर सीखने का सिद्धांत अपने आप सार्वभौम हो जाता है। सार्वभौमता का तात्पर्य सर्वमानव में स्वीकार होने से है। अतएव उल्लेखनीय बिन्दु यही है कि हर नर-नारी समझदारी पूर्वक ही परिवार में भागीदारी करता है। फलतः परिवार सार्थकता रूपी समाधान, समृद्धि रूपी उपकार हर समझदार परिवार में स्वस्फूर्त विधि से प्रमाणित होता है। उपकार विद्या ही मुख्य बिन्दु है। धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, करुणा का प्रमाण सर्वविदित होने और सर्वसुलभ होने का तथ्य है। धीरता वीरता पूर्वक मानव सम्पूर्ण उपकार कार्य करता है।
उपकार विधि से ही मानव परम्परा सार्थक होती है। मानव परम्परा की सार्थकता का तात्पर्य समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व लक्षित समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेंदारी ही है। इसका प्रमाण विधि व्यक्ति सम्पदा के रूप में वैभवित होने और मूल्यांकित होने के रूप में है ऐसे समझदार मानव परिवार में समाधान, समृद्धि, उपकार वैभवित होने और मूल्यांकित होने, समाज में अर्थात् विश्व परिवार में समाधान, समृद्धि, अभय सार्थक होने और मूल्यांकित होने; विश्वमानव व्यवस्था सहज फलन समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व प्रमाणित होने और मूल्यांकित होने के रूप में ही हर मानव सम्पूर्ण मानव है। सम्पूर्ण मानव अपनी सार्थकता को अनुभव करते हैं। हर मानव में सार्थकता की अनुभूति जागृति प्रामाणिकता सहित छः ऐश्वर्यों को समाधान,समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व के रूप में प्रयोजित नियोजित होने उसकी निरंतरता