के रूप में मूल्यांकित होने से है। इस विधि से हम अपने अवधारणा में धीरता, वीरता, उदारता को परिवार में और परिवार लक्ष्य के रूप में मूल्यांकित कर सकते हैं। विश्व परिवार रूपी समाज में धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा को मूल्यांकित कर सकता है।
31. भाव 32. संवेग
भाव :- मौलिकता = मूल्य।
संवेग :- संयोग से प्राप्त गति। संयोग = पूर्णता के अर्थ में प्राप्त योग।
अस्तित्व में भाव मौलिकता के रूप में विद्यमान है। उसका कार्य रूप “त्व” सहित व्यवस्था ही है। इसी आधार पर अस्तित्व सम्पूर्ण अथवा अस्तित्व समग्रता में व्यवस्था है। यही अस्तित्व सहज सहअस्तित्व सहज भाव है। अस्तित्व में सम्पूर्ण व्यवस्था समस्त एक-एक है। “अस्तित्व” अपने स्वरूप में व्यापक सत्ता में संपृक्त अनंत इकाईयाँ हैं। अस्तित्व ही चार अवस्थाओं पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था तथा ज्ञानावस्था में स्पष्ट है। ज्ञानावस्था में मानव इस धरती पर शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में वर्तमान है। शरीर वंश परम्परा है। जीवन विकास जागृति क्रम में सहअस्तित्व सहज संयोग है। इसका प्रमाण गठनपूर्णता, क्रियापूर्णता, आचरणपूर्णता ही है और प्रत्येक एक अपने वातावरण सहित सम्पूर्ण होना ही है। जीवन परमाणु विकास क्रम में चैतन्य पद में संक्रमित जागृति पूर्वक “त्व” सम्पन्न इकाई है। इस प्रकार मानव ज्ञानावस्था की जीवन जागृति और जागृति क्रम में सहज अभिव्यक्ति है। मानव जागृति पूर्वक ही व्यवस्था है और व्यवस्था में उसका भागीदारी सम्पन्न होना पाया जाता है।
मानव जागृति क्रम में जागृति सहज आवश्यकता संपन्न है। इसका साक्ष्य है कि मानव परम्परा में ही जानने-मानने, पहचानने-निर्वाह करने का वैभव और आवश्यकता जागृत संचेतना के रूप में वर्तमान है। अजागृत अर्थात् भ्रमित व्यक्ति में भी जागृति की आवश्यकता बनी ही रहती है। जीवन जागृति परम्परा अनुभव मूलक प्रणाली है। जागृति परम्परा में ही मानव सर्व शुभकारी को चिराकांक्षित स्वतंत्रता और स्वराज्य सहज सुलभ रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है। तभी जागृत मानव में मानवीयता सहज ही चरितार्थ होती है। मानवीयता मानव की मौलिकता है। यही मानव का स्वभाव व मानव भाव है। मानवीयतापूर्ण भावों के अनुरूप (मूल्यों) प्रवर्तन (परावर्तन, प्रत्यावर्तन) कार्य, व्यवहार, विचार, उत्पादन, विनिमय, उपयोग, अपेक्षा, व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी के रूप में प्रमाणित होता है। ऐसी मानसिकता का नाम संवेग