के प्रति सम्मान, प्रतिभा व व्यक्तित्व का संतुलित उदय, व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में (उत्पादन में) स्वावलम्बी बनता है। फलस्वरूप अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करने की अर्हता स्थापति हो पाती है और अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था सफल होती है। मानव सहज मौलिक भाव और संवेग पूर्वक इसी क्रम में जीवन अपने सम्पूर्ण वैभव को जानने-मानने के क्रम में भाव और संवेगों को पहचानने के क्रम में यह मनोविज्ञान प्रस्तुत है। इसीलिए मानवत्व रूपी भाव सहित मानवीय आचरण व्यवहार को और मानवीय शिक्षा-संस्कार को पहचानना ही एक मात्र उपाय है। इन सबके मूल में अस्तित्व में मानव का अध्ययन ही प्रधान बिंदु है। सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व ही सम्पूर्ण भाव है। शिक्षा स्वयं में भाव है, वह सम्पूर्ण वस्तु (वास्तविकता) का स्रोत है। जागृत शिक्षा सहज अध्ययन से सम्पूर्ण भाव विदित होता है, विदित हुआ है। मूल्य स्वयं भाव है अखंड समाज का यह सूत्र है। व्यवस्था एक भाव है। न्याय सुलभता, विनिमय सुलभता, उत्पादन सुलभता, स्वास्थय-संयम सुलभता और मानवीय शिक्षा संस्कार सुलभताएँ उसके रूप, गुण, स्वभाव, धर्म, मात्रा, उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशीलता के आधार पर ध्रुवीकृत होता है, परम्परा में सार्थक होता है। हरेक क्रिया के मूल में रूप, गुण, स्वभाव व धर्म अविभाज्य है। रूप और गुण में, से गुण ही अर्थात् गति ही संवेग है, स्वभाव व धर्म भाव है।
स्वभाव व धर्म ही मानव परम्परा में, से, के लिए प्रयोजनीय है, रूप और गुण उपयोगी है। यह समझदारी से निर्धारित होता है। व्यवस्था, व्यवहार, आचरण, उत्पादन, उपयोग, सदुपयोग, सुरक्षा, अस्तित्व, सहअस्तित्व, विकास, जीवन, जागृति और रासायनिक-भौतिक रचना-विरचनाएँ भाव हैं। सभी वस्तुएं सहज रूप में मानवीयता पूर्ण परम्परा में, से, के लिए प्रधान सार्थक सूत्र है। यही अध्ययन की सम्पूर्ण वस्तु है। मानव की सार्थकता अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में प्रमाणित होता है। सार्वभौमता व अखंडता भी भाव है। इस प्रकार भावों की अभिव्यक्ति, संप्रेषणा ही, प्रामाणिकता, प्रमाण के रूप में स्पष्ट होती है। भावों को जीने की कला में सार्थक बनाने योग्य और निरंतर प्रायोजित होने वाली मानसिकता ही संवेग है।
33. जाति 34. काल
जाति :- 1. रूप, गुण, स्वभाव व धर्म की विशिष्टता, भौतिक क्रिया, एकता, विविधता। 2. भौतिक वस्तुओं में अनेक प्रजाति के परमाणु।