पदार्थावस्था में अणु, अणु रचित पिंड अनेकता के रूप में है यही जाति है। प्राणावस्था में बीजानुषंगी विधि से अनेक प्रकार की प्रजातियाँ अपने-अपने मौलिकता के साथ दृश्टव्य है। यह जातियाँ है। जीववास्था संसार में अनेक प्रजातियाँ वंशानुषंगीयता के आधार पर दृश्टव्य है। ज्ञानावस्था के मानव संस्कारानुषंगी (समझदारी के अनुसार) आधार पर प्रमाणित होने वाले मानव जाति का एक ही होना पाया जाता है।

काल :- क्रिया की अवधि।

मानव जाति अपने स्वरूप में मानव में, से, के लिए मौलिकता का प्रकाशन है। मौलिकता में हर जागृत मानव का “त्व” सहित व्यवस्था समाहित रहती है। यह विकास क्रम, विकास, जागृति क्रम और जागृति का प्रमाण है। इस वर्तमान में अर्थात् बीसवीं सदी की दसवीं दशक में सर्वाधिक मानव भ्रांतिपद में है। अर्थात् ज्ञान समृद्ध होने के लिए उम्मीदवार के रूप में है इसलिए जागृति क्रम में होना स्वीकार होता है। सर्व मानव ही ज्ञानावस्था की इकाई के रूप में वर्तमान है।

जातियों का दर्शक मानव है अर्थात् समझने वाला मानव है। पदार्थावस्था से ज्ञानावस्था के जागृत मानव पर्यन्त जातियों की विविधता वर्तमान है। इन विविधताओं के मूल में जो मौलिक वस्तु है यही जाति व समुदाय का आधार है। मानव परम्परा के अतिरिक्त और सभी अवस्था यथा जीवावस्था, प्राणावस्था, पदार्थावस्था में प्रत्येक एक-एक समुदाय अपने-अपने जाति के अनुसार आचरण करता हुआ देखने को मिलता है। यही “त्व” सहित व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी का सूत्र है। मनुष्येत्तर प्रकृति में हर जाति अपने-अपने समुदाय के रूप में मौलिक है क्योंकि व्यवस्था सूत्र से सूत्रित है। मानव को अखंड जाति के रूप में प्रदिपादित संबोधित करने के क्रम में यह शास्त्र है।

मानव जब मानवत्व को पहचानता है, स्वीकारता है निश्चय करता है तभी जागृति के प्रमाण के रूप में स्वंय में व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता है। मानव का स्वत्व मानवत्व है ही, इसलिए मानवजाति का आधार मानवत्व है। स्वतंत्रता व स्वराज्य ही मानवत्व का लक्ष्य है। प्रत्येक मानव मानवीयता पूर्ण आचरण पूर्वक ही मानव है। इसे हर देश काल परिस्थिति में परखा गया है। यह जागृति का वैभव है। इस प्रकार हर एक जागृत मानव “त्व” सहित व्यवस्था के रूप में जागृत मानव परम्परा सहज होना स्पष्ट है। अस्तु, मानवत्व सहज समानता के आधार पर मानव का भी परम्परा के रूप में स्पष्ट होना ही व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी होने का तात्पर्य है। मानवीयतापूर्ण मानव परम्परा में ही मानव जाति की अखंडता वर्तमानित

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