होती है। यही अखंड समाज का सूत्र है। जागृत मानव की मौलिकता यही है। यह सम्बंधों को पहचानने व मूल्यों को निर्वाह करने के क्रम में, से, के लिए स्पष्ट है। सम्बंधों को पहचानना, निर्वाह करना तभी संभव हो पाता है जब जीवन ज्ञान, अस्तित्वदर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण में पारंगत हो जाये। इसी के लिए मानव परम्परा में बहुआयामी प्रयास की आवश्यकता है। अतएव जागृत विधि से व्यवस्था सूत्र अपने-आप निष्पन्न और प्रमाणित होता है। जागृत परिवार मानव ही अखंड समाज में भागीदारी करने में तत्पर होते है। मानव मूलतः परिवार मानव है क्योंकि परिवार में ही आरंभिक व्यक्तित्व और प्रतिभा के संतुलन की अपेक्षा एवं प्रमाण होना पाया जाता है। परिवार में संबंध और मूल्यों की पहचान और निर्वाह होने के क्रम में व्यवस्था सूत्र स्पष्ट होना पाया जाता है। ऐसे परिवार में नियम, नियंत्रण, संतुलन, न्याय सहज ही प्रमाणित होता है। न्याय का प्रामाणिक होना ही प्रधान रूप है। फलस्वरूप परिवारगत व्यवसाय भागीदारी सहज हो जाता है। व्यवसाय के साथ विनिमय की अनिवार्य स्थिति बनती है। विनियम सहजता के लिए विभिन्न वस्तुओं को श्रम मूल्य के आधार पर विनियम कार्य को स्थापति कर लेना मानव सहज कार्य है। इस क्रम में श्रम मूल्य और श्रम को पहचानना एक अनिवार्यता बन पाती है। श्रम मूल्य का स्रोत प्रत्येक मानव में स्वस्थ शरीर एवं स्वस्थ मानस ही है। स्वस्थ मानस का स्वरूप प्राकृतिक ऐश्वर्य पर श्रम नियोजन पूर्वक उपयोगिता व कला मूल्य स्थापित करने, सम्बंधों व मूल्यों को पहचानने व निर्वाह करने, व मूल्यांकन करने के रूप में प्रमाणित होता है। इसी के साथ अस्तित्व, अस्तित्व में सहअस्तित्व, विकास, जीवन, जीवन जागृति, रासायनिक-भौतिक रचना-विरचनाओं के प्रति समझदारी जो जानने-मानने के रूप में प्रमाणित होती है यही स्वस्थ मानस का स्वरूप है। इसे निपुणता, कुशलता, पाण्डित्य के नाम से इंगित कराया जाता है। निपुणता = प्राकृतिक ऐश्वर्य पर उपयोगिता व कला मूल्य को स्थापित कर प्रमाणित करना। कुशलता = प्राकृतिक ऐश्वर्य पर उपयोगिता मूल्य स्थापित करना। पांडित्य = ज्ञान विज्ञान विवेक सम्मत सूझ-बूझ तैयार करने तद्नुसार प्रमाणित होने से है। यह प्रत्येक मानव में, से, के लिए संभव है। ऐसी संभावना को सर्वसुलभ बनाए रखना मानव परम्परा है। ऐसी मानव परम्परा के आधार पर ही मानव जाति की एकता, अखंडता व अक्षुण्णता सहज ही होना पाया जाता है। इस प्रकार मानव जाति एक ही है। यह अपने आप स्पष्ट है। मानव परम्परा का वैभव अथवा मानव परम्परा का वैभव, ज्ञानावस्था का मानव, संस्कारानुषंगी अभिव्यक्ति होने के कारण मानवीय शिक्षा, संस्कार, मानवीय संविधान, परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था मानवीयतापूर्ण

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