ही काल का दृष्टा होता है न कि काल मानव को व्याख्यायित कर पाता है। कालखंड की सीमा में मानव व्याख्यायित नहीं हो पाता। क्रिया की अवधि को काल के रूप में गणना करना इसलिए आवश्यक है कि प्रत्येक संयोग-वियोग घटनाओं को, फल परिणाम घटनाओं को, परिवर्तन घटनाओं को काल और संख्या क्रम में गणना करते है। जबकि सम्पूर्ण वस्तु क्रिया निरंतर बना ही रहता है। जैसे - शरीर रचना की एक निश्चित अवधि में आरंभ होना, शिशु, बाल्य, कौमार्य, यौवन, प्रौढ़ और वृद्ध अवस्थाओं को पार करता हुआ एक दिन शरीर विरचित हो ही जाता है। इस अवधि को हम काल के नाम से जानते है। जबकि रचना-विरचना अनुस्युत क्रिया है। रचना-विरचना नित्य निरंतर होने वाली घटना है साथ ही रचना में सम्मिलित होने वाली वस्तुएं अस्तित्व में रहती ही हैं। अस्तु काल गणना किसी क्रिया की अवधि के रूप में पहचानी गई है जैसे यह धरती अपने में सूर्योदय से सूर्योदय तक। काल का दृष्टा होने का तात्पर्य क्रिया और क्रिया की अवधि, धटना, परिणाम, स्थिति, गति, अनंत, व्यापक का दृष्टा होने से है। इस प्रकार अस्तित्व दृष्टा भी मानव है। अस्तित्व सहज रूप में नित्य वर्तमान है। अस्तित्व अपने में न कोई शुरूआत है न कोई अंत है। ग्रह-गोलों के संबंध में वे कितनी संख्या में अस्तित्व में है इसकी आवश्यकता मानव जाति को नहीं है। जितनी आवश्यकता बनती है उतने में से कुछ ग्रह-गोलों को मानव समझने का प्रयत्न करता ही है। अभी तक इस धरती के मानव ने जो पता लगाने की कोशिश की है उसमे सकारात्मक सार्थक उद्देश्य कुछ भी नहीं रहा। इन प्रयासों के चलते दूरसंचार कार्य सार्थक हो गया। यही सकारात्मक भाग है। हर छोटी से छोटी या बड़ी से बड़ी वस्तु का अस्तित्व बना ही रहता है। विकास क्रम और रचना क्रम में जो परिणाम होते हैं उसकी अवधि को समझा जाना संभव है। जैसे एक बीज बोकर नैसर्गिकता के संयोग सहित पुनः बीज पर्यन्त अवधि को पहचाना जा सकता है। विभिन्न द्रव्यों का संयोग कर रासायनिक रूप में परिणामों को देखा जा सकता है। इसकी अवधि भी समझी जाती है। किसी वस्तु को अम्लीय-क्षारीय संयोग में लाकर उसके परिणाम को पहचाना जा सकता है इसकी अवधि को आंकलित किया जा सकता है। जीव और मानव शरीर प्राणकोषाओं से रचित भ्रूण सूत्रों का रासायनिक वैभवों के संयोग से विपुलीकरण विधि और ऐसे भ्रूण सूत्रों से संपादित एवं रचित रचनाओं की अवधियों को पहचानना सहज है, इसका आकलन संभव है। इस प्रकार हर रचना की विरचना का भी आकलन होता है। इन्हीं सहज तथ्यों के आधार पर सम्पूर्ण यंत्रों की रचना विधि, कार्य विधि, उपयोग विधि पहचानने में आती है। जिसका आकलन सहज है। इस प्रकार मानव के द्वारा पहचानी हुई क्रिया की अवधि रूपी काल की महिमा के वर्चस्व को मानव सुविधा के रूप में
Table of contents
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-2
प्राक्कथन
1
अध्याय - 1 - मानवीयता पूर्ण आचरण सहज व अनुसंधान क्यों?
5
अध्याय - 2 - मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान का आधार
14
अध्याय - 3 मानव सहज उपयोगिता-पूरकता
29
अध्याय - 4 अनुसंधान और लोकव्यापीकरण
36
अध्याय - 5 जागृति व आचरण
36
5.1 जीवन में अविभाज्य मन में होने वाली 64 आचरण
Subsection
92
5.2 वृत्ति
Subsection
92
5.21 वृत्ति में होने वाले 36 आचरण
Subsection
150
5.3 चित्त
Subsection
150
5.31 चित सहज 16 आचरण
Subsection
192
5.4 बुद्धि सहज चार आचरण
Subsection
192
5.5 आत्मा सहज दो आचरण
Subsection