संस्कृति-सभ्यता परम्परा का प्रधान आयाम है। जागृत मानव संस्कृति सभ्यता सहित सार्वभौम व्यवस्था और अखंड समाज में भागीदारी का प्रमाण है। एवं उसकी सार्वभौमता सहज है।
ये सब संगतियाँ मानव को जागृति के लिए उत्प्रेरित करती हैं। हर संतान के लिए परम्परा ही जागृति का स्रोत है। परम्परा के चारों आयामों का जागृति सूत्र और व्याख्या होना ही स्वस्थ मानव परम्परा है। हर मानव संतान के लिए पीछे पीढ़ी परम्परा के रूप में सुलभ सार्थक होने का स्रोत है। अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन ज्ञान पूर्वक जीवन ज्ञान सहित मानवीय शिक्षा-संस्कार, मानवीय आचार संहिता रूपी संविधान व सार्वभौम व्यवस्था को पहचानना सुलभ हो पाता है। इस प्रकार जागृत परम्परा में मानव जाति का एक होना स्पष्ट हो जाता है।
काल :- काल क्रिया की अवधि के रूप में गणना किया जाता है। नित्य वर्तमान ही काल है। सम्पूर्ण क्रियाएँ निश्चित अवधि के अनंतर पुनःआवर्तित होती हैं अथवा परिणाम और परिवर्तन समस्या या समाधान को प्राप्त करती हैं। इसी क्रम में काल गणना का होना पाया जाता है। इसलिए क्रिया की अवधि = काल की पहचान मानव ने की है। इसी आधार पर प्रत्येक क्रिया को काल की अवधि में देखने का प्रयास मानव करता है। प्रत्येक क्रिया अपने में नियति सहज निरंतर है। मानव जो काल की अवधि में क्रियाओं को प्रमाणित करने गया वह केवल जड़ प्रकृति के साथ आंशिक रूप में सफल हो पाया जो यंत्र संसार है। उल्लेखनीय बात यह है कि सम्पूर्ण यंत्र मानव की कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों की गति को विपुल (अर्थात् अधिकाधिक गति) बनाने के क्रम में सार्थक हुए हैं। यही दूर संचार क्रियाकलाप है। कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों की स्वभाव गति जीवन जागृति पूर्वक सामाजिक हो पाती हैं। जागृति हर मानव को स्वीकृत है। काल का दृष्टा मानव है इसलिए किसी क्रिया की अवधि में अर्थात् भौतिक क्रिया की अवधि में मानव व्याख्यायित नहीं हो पाता। अस्तित्व नित्य वर्तमान है, सहअस्तित्व नित्य वर्तमान है। भौतिक-रासायनिक क्रियाकलाप नित्य वर्तमान है, जीवन नित्य है ही। इस प्रकार काल की अवधि में किसी भी वस्तु की सटीक व्याख्या संभव नहीं है। क्योंकि वस्तु की क्रियाशीलता निरंतर है। सहज तथ्य यही है कि हर अवस्था पद में स्थित हर वस्तुओं को वर्तमान के आधार पर पूर्णतया समझा जा सकता है क्योंकि हर एक वस्तु अपने रूप, गुण,स्वभाव सहित अपने वातावरण सम्पन्न पाया जाता है, यह अध्ययनगम्य है। इसी सत्यतावश अध्ययनगम्य कराने के क्रम में ही यह मनोविज्ञान शास्त्र प्रस्तुत है। मानव अपने दृष्टा पद प्रतिष्ठा क्रम में ही सम्पूर्ण क्रिया, स्थिति, गति, विकास, परिणाम, परिवर्तन और जागृति को पहचानता है। प्रमुख बात यह है कि मानव