35. तुष्टि 36. पुष्टि

तुष्टि :- समझदारी पूर्वक छह सद्गुणों से सम्पन्न होना; परिवार में समाधान, समृद्धि को प्रमाणित करना; अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी करना निरन्तर तुष्टि का स्वरूप है।

पुष्टि :- तुष्टि का निरंतर मूल्यांकन निरीक्षण, परिक्षणपूर्वक किया जाना। पूर्णता की निरंतरता ही जीवन सहज संतुष्टि है। मानव परम्परा के रूप में उसका लोकव्यापीकरण होना ही पुष्टि है। यह जागृति पूर्वक ही प्रमाणित होता है।

मानव, शरीर और जीवन का संयुक्त रूप है यह विदित है। यह स्वयं जड़-चैतन्य प्रकृति की सहअस्तित्व सहज साक्षी है। एक-एक शरीर में अनेकानेक प्राणकोशाएँ रचनाकार्य में भागीदारी करते रहते है यह सभी कोशाएँ विधिवत करते ही रहते है। इसका साक्ष्य हर शरीर और वनस्पतियों की रचना अपने में एक व्यवस्था के रूप में होना पाया जाता है। जैसे मानव शरीर में मेधस तंत्र, हृदय तंत्र, रक्त तंत्र, वसा तंत्र, फेफड़ा तंत्र, यकृत तंत्र, मूत्र तंत्र, वृक्क तंत्र, गर्भाशय तंत्र, रस तंत्र, मांस तंत्र ये सब एक साथ गर्भाशय में रचित संयोजित होते हैं। परिणाम स्वरूप रक्त संचार, श्वास संचार बिना जीवन के ही सम्पन्न होता हुआ देखने को मिलता है। तंत्र का तात्पर्य उर्मि और स्पंदन से है। हर प्राणकोशाएँ स्पंदनशील है। इसकी साक्षी हर कोशाओं में होने वाली श्वसन क्रिया है। रासायनिक द्रव्य में परस्पर योग-संयोग पूर्वक उत्सवित होना तरंगति होना ठोस, तरल, विरल के रूप में पाया जाता है इसी का नाम उर्मि है। अर्थात् रसायन तत्व में पाये जाने वाला उत्सव है। ऐसे उत्सव पूर्ण रसायन द्रव्य ही अनेक प्रजाति प्रयोजन सहज रचना के रूप में इसी धरती पर प्रमाणित है। इन्हीं के संयोग से अर्थात् रासायनिक उर्मि और प्राणकोशाओं का स्पंदन के संयुक्त रूप में पूरे शरीर में अंग और अवयव रूपी रचनाओं में तंत्रणा अपने अपने निश्चित कार्य करता हुआ देखने को मिलता है। जैसे रक्त प्रणाली (हृदय धड़कना) श्वास लेना गर्भाशय में स्थित शिशुओं में भी होना पाया जाता है। यही तंत्र का तात्पर्य जीवन संयोग के उपरांत ज्ञानेंद्रियाँ कार्यरत होना पाया जाता है। इस कारण शरीर द्वारा ही मानव परम्परा में जीवन जागृति का प्रमाण सहज है। जीवन संतुष्टि का प्रथम चरण सम्बंधों की पहचान व मूल्यों के निर्वाह के रूप में देखने को मिलता है। दूसरी स्थिति में विश्वास की अभिव्यक्ति सहज है। यह अखंड समाज का सूत्र है। संबंधों व मूल्यों को पहचानने व निर्वाह करने के क्रम में समाज सूत्र स्पष्ट हो पाते हैं। इस को दूसरी विधि से प्रक्रिया रूप में मानव संबंध व नैसर्गिक संबंध के रूप में पहचाना जाता है।

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