धारक-वाहक हो सके। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध ये पाँचों स्मृति के रूप में जीवन में ही प्रभावित रहते हैं। इसी क्रम में नियम, न्याय, धर्म और सत्य की प्यास है। जीवन तृप्त होने का यही स्रोत है। नियम का प्रमाण नियंत्रण संतुलन सहित पूरकता के रूप में है। नियंत्रण और संतुलन स्वभाव गति के रूप में देखा जाता है। देखने का कार्य समझना है, समझने का कार्य जीवन में है। जीवन में ही जानने-मानने, पहचानने का सम्पूर्ण वैभव समाहित रहता है। मानव परम्परा के रूप में प्रमाणित होने के क्रम में शरीर के द्वारा निर्वाह सम्पन्न होना पाया जाता है। इससे शरीर की महत्ता एवं प्रयोजन स्पष्ट हो जाता है कि मानव परम्परा में प्रमाणित होने के क्रम में शरीर एक आवश्यकीय अनिवार्य माध्यम है।

प्रकारान्तर से केवल, जीवन के आधार पर अथवा केवल शरीर के आधार पर मानव परम्परा को व्याख्यायित करने वाले सभी प्रयास पराभवित हो चुके हैं। इस तथ्य को ध्यान में लाना इसलिए आवश्यक है कि मानव परम्परा में ऐसे बहुतायत प्रयास हो चुके हैं। अभी तक किसी भी सार्थक प्रयास से अथवा मान्य सार्थक प्रयासों से समुदायचेतना से मुक्त होना और समाज चेतना से संपृक्त होना संभव नहीं हो पाया। जबकि समुदायों में “श्रेष्ठता” सहज रूप में प्राप्त है। श्रेष्ठ समाज की कल्पना अवश्य ही आती रही है। यह सब समुदाय के रूप में ही सिमटता रहा है। इसका मूल तत्व यह रहा है कि प्रकारान्तर से जीवन कल्पना को परम सत्य मानते हुए अपने-अपने तरीके से आचार संहिता को प्रस्तुत किए। कुछ समुदाय शरीर मरणशील होने के आधार पर कोई शाश्वत् वस्तु जैसे ब्रह्म, ईश्वर नाम और मान्यता के आधार पर आत्मा, रूह आदि नाम दिये। मान्यतायें बनी रहीं। फलतः इस क्रम में कल्पना के आधार पर आचार संहिता को मानते हुए चलते आए हैं। इन दोनों विधियों से जितने भी प्रयास हुए पूरक विधि निकल नहीं पायी।

देहवाद से भोगवाद, ईश्वरवाद से एकान्तवाद, भक्ति-विरक्ति के रूप में प्रचलित हुआ। एकांटवाद - जिसमें अकेले की महिमा, विशेषता, मोक्ष केवल अकेले के लिए संभव है स्वर्गवाद - अकेले के लिए स्वर्ग। इन मान्यताओं और आश्वासन विधियों से केवल व्यक्तिवादी अहंता, उससे होने वाली लाभ-हानि मानव परम्परा में हाथ लगी। जबकि अकेले की कोई स्थिति, गति नहीं है। अस्तित्व ही सहअस्तित्व है। हर मानव का सहअस्तित्व में वैभवित रहना स्वाभाविक है। सत्तामयता भी अकेले नहीं है, प्रकृति भी अकेली नहीं है। दूसरे के साथ ही एक अपने वैभव को प्रमाणित करता है। सम्पूर्ण एक-एक सत्ता में ही वैभवित है। सम्पूर्ण सत्ता प्रकृति के साथ

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