वैभवित है। इस तथ्य के साथ अकेले कुछ भी नहीं है। सहअस्तित्व ही सम्पूर्ण एक-एक का और समग्र अस्तित्व का सूत्र और व्याख्या है।
जो शरीर को जीवन समझे उनकी विधि से भोगवाद पनपा। भोगवाद के साथ संग्रह भी एक कड़ी बना। संग्रह का तृप्ति बिंदु नहीं मिला सबके लिए संग्रह संभव नहीं हुआ क्योंकि संग्रह की मात्रा का निर्णय संभव नहीं हो पाता। फलस्वरूप सबको संग्रह सुलभ ही नहीं बन पाया। युद्ध, विद्रोह, द्रोह, शोषण की मानसिकता और भी बलवती हुई है। इसी के चलते नैसर्गिक असंतुलन, प्रदूषण के आधार पर पनपता आया। यह किसी मानव के लिए स्वीकृत वस्तु अथवा स्वीकृत घटना नहीं है। इससे मनोविज्ञान पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता बनी ही रही।
हम मानव प्रकान्तर से संतुलन, समृद्धि, समाधान और समाज न्याय को स्वीकारते आए हैं चाहे हमें देहवाद (भोगवाद) और रहस्यमय अध्यात्मवाद का उपदेश देते रहें। इन दोनों विधियों से चला आया मानव स्वीकृति के अनुरूप कोई निश्चित फलन सर्वजनोपयोगी होने की विधि से निष्पन्न नहीं हो पाया। प्रयत्न विविध रूपों में होते आए। सभी प्रयास देहवाद और ईश्वरवाद (आत्मवाद) ही रहे हैं।
मानव संचेतना का अध्ययन ही शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में है। यह अध्ययनगम्य है। अस्तित्व में ही व्यापक रूप में साम्य ऊर्जा नित्य वर्तमान है। इसे ईश्वर नाम दिया है। इस बात की चर्चा पहले हो चुकी है। अस्तित्व, जीवन और जीवन जागृति समझने के उपरान्त मानव परम्परा में मानव सहज सामाजिक अखंडता, मानव सहज व्यवस्था में सार्वभौमता समीचीन है। इसलिए भी मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान पर ध्यान देना आवश्यक रहा है।
मानव संचेतना का तात्पर्य ही संज्ञानशीलता, संवेदनशीलता का संयुक्त रूप है जो जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करने का क्रियाकलाप है। इसी का अध्ययन है। इसमें पारंगत, निष्णात और प्रमाणित होने के अर्थ में मानव सहज संचेतना, उसका वैभव प्रत्येक व्यक्ति में इसकी सार्थकता को स्पष्ट करना इस मनोविज्ञान का आशय है। दूसरे तरीके से मानव संचेतना का अध्ययन अर्थात् मानव के सम्पूर्ण आयाम, दिशा, कोण, परिप्रेक्ष्यों में सार्थकता का निरूपण, विश्लेषण और निष्कर्ष है।
अस्तित्व में मानव का निर्भ्रम होना ही सम्पूर्ण रहस्यों से मुक्ति है। रहस्य की बात तीन तरीकों से मानव परम्परा में उभरी हुई देखा जाता है-