मानव संबंधों का सम्बोधन भले ही कितने ही प्रकार का हो तरीके भिन्न-भिन्न क्यों न हो, सभी संबंधों को पहचानने के प्रमाण में जीवन सहज रूप में मूल्य व्यक्त होता है। ऐसा मूल्य जागृत जीवन में नौ स्वरूप में उत्प्रेरित उत्सवित रहता ही है। संबंधों को पहचानना ही मानव परम्परा का एक प्रधान कार्य है। यही निर्वाह के रूप में संस्कार है। सम्बंधों को पहचानने के क्रम में ही संस्कार सफल हो पाते हैं।
अस्तित्व में नैसर्गिकता के साथ मानव का पूरक संबंध बना ही रहता है। मानव ही इस धरती पर सर्वाधिक विकसित इकाई है। सर्वाधिक का तात्पर्य प्राणावस्था, पदार्थावस्था व जीवावस्था से अधिक विकसित से है। मानव शरीर के रूप में यह नियति क्रम सहज घटना और मौलिकता है। नियति क्रम का तात्पर्य विकास व जागृति क्रम से है। विकास शरीर रचना के अर्थ में जागृति जीवन के अर्थ में प्रमाणित होता है। ऐसी मौलिकता प्रत्येक मानव में कर्म स्वतंत्रता व कल्पनाशीलता के रूप में वर्तमान है। इनका प्रयोग प्रत्येक मानव करता है। ये नियति सहज रूप में मानव में प्रकाशित होते है। हर भ्रमित मानव में यह प्रश्न सहज ही उभर आता है कि अंततोगत्वा इस कर्म स्वतंत्रता व कल्पनाशीलता का क्या प्रयोजन है? क्यों यह सर्वसुलभ हुआ है? ऐसा सोचने पर पता चलता है कि इनके तृप्ति बिंदु को पहचानना है। यही संतुष्टि सूत्र और व्याख्या सूत्र है। संतुष्टि मानव की कर्म स्वतंत्रता और कल्पनाशीलता का ही होता है। अनुसंधान और शोध से पता चला कि कल्पनाशीलता का तृप्ति बिंदु परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था है। इसका परम स्वरूप विश्व परिवार व्यवस्था ही है।
जब परिवार मूलक स्वराज्य होना ही निर्देशित हो गया तब परिवार को समझना अर्थात् परिवार की परिभाषा व व्याख्या को समझना और उसके योग्य अहर्ता को प्रत्येक व्यक्ति जानना-मानना, पहचानना एक अनिवार्यता है। निश्चित संख्या में जागृत मानव (नर-नारी) परस्पर संबंधों को पहचानते व मूल्यों का निर्वाह करते हैं और परिवार गत उत्पादन कार्य में परस्पर पूरक होते हैं। ऐसे कम से कम 10 व्यक्तियों का समूह परिवार की संज्ञा है। ऐसी परिभाषानुरूप ग्राम परिवार, ग्राम समूह परिवार, क्षेत्र परिवार, मंडल परिवार, मंडल समूह परिवार, मुख्य राज्य परिवार, प्रधान राज्य परिवार, विश्व स्वराज्य परिवार के रूप में सहज ही गण्य होता है। इस क्रम में संबंधों व मूल्यों का निश्चयन होता है। फलस्वरूप प्रत्येक अवधिगत परिवार व्यवस्था अपने आप में सभी स्तरीय परिवारों में सूत्रित हो जाता है। यही परिवार मूलक का तात्पर्य है।