वाली सम्पदा में है। सदुपयोग क्रम में और आवर्तनशील प्रक्रिया सहित उपयोग सहज विधि से इस धरती की सम्पदा अपने में अक्षुण्ण है और पर्याप्त है। इसके साक्षी में हर जागृत मानव परिवार इस धरती पर जितने भी संख्या में है इनमें से प्रत्येक परिवार आवश्यकता से अधिक उत्पादन और समृद्धि का अनुभव कर सकता है। इसके विपरीत भ्रमपूर्वक छीना-झपटी, संग्रह-सुविधा, लिप्सा और संघर्ष के वशीभूत होकर दरिद्रता की पीड़ा से पीड़ित होता है। सदुपयोग सुरक्षा विधि से ही उत्पादन सुलभता और लाभ-हानि मुक्त विनियम कोष सुलभता सहज ही प्रमाणित होती है। यह जागृत मानव का ही वैभव है।

परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था की अक्षुण्णता के लिए मानवीय शिक्षा-संस्कार व स्वास्थ्य-संयम की अनिवार्यता है। तभी न्याय सुरक्षा, उत्पादन कार्य और विनियम कोष कार्य सुचारू रूप में संचालित हो पाता है यही पाँचों आयाम परिवार मूलक स्वराज व्यवस्था की नित्य गति है। यह समझदारी और जागृति पूर्वक ही सार्थक होना पाया जाता है। मानवीय शिक्षा संस्कार अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन ज्ञान सहज उद्यम है जिससे पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था व ज्ञानावस्था (मानव) का अध्ययन सहअस्तित्ववादी विधि से सम्पन्न होता है। स्वास्थ्य संयम का तात्पर्य मानवीयता पूर्ण मानसिकता बनाम मानव संचेतना सहज रूप में शरीर के द्वारा प्रकाशित, संप्रेषित, अभिव्यक्त होने योग्य शरीर व्यवस्था से है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन समृद्धि के रूप में प्रमाणित होता है। तन-मन-धन रूपी अर्थ का सदुपयोग सुरक्षा है न्याय के रूप में प्रमाणित होता है। ऐसी स्वराज्य व्यवस्था सहज ही कल्पनाशीलता की संतृप्ति और मानव परम्परा में उसकी पुष्टि सहज है।

कर्म स्वतंत्रता का तृप्ति बिंदु स्वतंत्रता है जो स्वानुशासन के रूप में प्रमाणित होता है। स्वानुशासन जीवन जागृति, मानव समाधानित होने का जागृति का प्रमाण है। जबकि स्वतंत्रता मानव परम्परा अर्थात् मानवीय शिक्षा-संस्कार, संविधान, राज्य व्यवस्था का सामरस्यता है। यही अस्तित्व में मानव के जागृत होने का साक्ष्य है। जागृत परम्परा की धारक-वाहकता सहज प्रमाण, स्वराज्य के आधार पर मानवीय आचरण व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी, परिवार, समाज, व्यवहार, न्याय व सर्वतोन्मुखी समाधान ही सतत तृप्ति का स्रोत बना ही रहता है। फलस्वरूप प्रामाणिकता अर्थात् अस्तित्व, सहअस्तित्व, विकास, जीवन, जीवन जागृति, रासायनिक और भौतिक रचना-विरचना सहज सत्य को जानना-मानना, उसकी तृप्ति बिंदु में जीना, उसका निरंतर

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