स्वराज्य का तात्पर्य न्याय सुलभता, विनिमय सुलभता व उत्पादन सुलभता, स्वास्थ्य-संयम सुलभता, मानवीय शिक्षा-संस्कार सुलभता से है। न्याय सुलभता का स्वरूप सम्बंधों के अनुरूप अर्थात् जिससे जिनका जो संबंध पहचाना गया है उनसे उन-उन संबंधों के अनुरूप मूल्यों का निर्वाह होने से है। मूल्य जीवन सहज हैं। संबंधों की पहचान परम्परा सहज है। भले ही मानव अभी तक अंतर्द्वन्दों सहित समुदाय चेतना में ग्रसित है फिर भी संबंधों को पहचानने का प्रयास नैसर्गिक रूप में उभरते आया है इच्छुक है ही। अंतर्द्वन्दों और समुदायों की परस्परता में घृणा एवं उपेक्षा की ध्वनि व मुद्राएं समावेशित होने के फलस्वरूप संबंधों के प्रति निष्ठा स्थिर नहीं हो पाई। फलतः मूल्यों का अकाल नासमझी के रूप में त्रस्त करते ही आया। इस समीक्षा से यह पता चलता है कि मानव संबंधों में निष्ठान्वित होने के लिए मूल्यों को ही पहचानना आवश्यक है। इसी विधि से विश्व परिवार संबंध भी है। एक परिवार को पाँचों आयाम संबंधी क्रियाकलाप में भागीदारी करना अनिवार्य है पाँचों आयाम को ऊपर वर्णित कर चुके है। यह कहे गये सभी स्तरीय 10 संख्यात्मक परिवार से विश्व परिवार तक आवश्यकता है ही। यह तथ्य भली प्रकार से समझ में आता है।

इन संबंधों के प्रति निर्भ्रम होने के उपरान्त सहज ही विश्वमानव परिवार व्यवस्था की आवश्यकता व स्वरूप समझ में आता है फलतः कर्तव्य व दायित्व निश्चित होता है। इस प्रकार संबंधों व मूल्यों को पहचानने व निर्वाह करने के क्रम में मूल्यों की मूल्यांकन विधि अपने आप स्पष्ट होती है। माता-पिता, पुत्र-पुत्री, गुरू-शिष्य, पति-पत्नी, स्वामी-सेवक, मित्र-मित्र सभी संबंधों में विश्वास साम्य मूल्य है। इसका निर्वाह होना ही विश्वास की गवाही है। संबंधों के अनुरूप कृतज्ञता, गौरव, श्रद्धा, प्रेम, विश्वास, वात्सल्य, ममता, सम्मान, स्नेह स्थापित मूल्य सार्थक होता है। फलतः सम्बंधों का स्वरूप कर्तव्य व दायित्व की महिमा व निर्वाह सहज वर्तमान होता है। इसके योगफल में न्याय अपने आप सूत्रित, व्याख्यायित व वैभवित होता है। यही न्याय सुलभता का तात्पर्य है।

उत्पादन सुलभता प्रत्येक परिवारगत आवश्यकता का निश्चय होने के आधार पर सपन्न होना पाया जाता है। मानव को उत्पादन सुलभता में शरीर पोषण, संरक्षण और समाज गति की आवश्यकता है। इसी अर्थ में सार्थक होता है। सम्पूर्ण उत्पादन सदुपयोग, सुरक्षा क्रम में सार्थक होता है। उल्लेखनीय यह है कि लाभोन्माद, कामोन्माद, भोगोन्माद क्रम में सर्वाधिक वस्तु का अपव्यय होता है। सम्पूर्ण मानवोपयोगी वस्तुओं का स्रोत चिन्हित रूप में धरती में पाई जाने

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