वर्तमान होना ही प्रामाणिकता है। जागृति भ्रम मुक्ति और भय मुक्त जीवन है। मुक्ति समझदारी और प्रमाणिकता प्रमाण सहज योगफल में होना पाया गया है।

जागृत जीवन मानसिकता स्वयं जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्यों को मूल्यांकित करने व्यवहार और विनिमय में प्रमाणित करने में सार्थक होने में पाया जाता है। मानव का अवतरण जलवायु, भौगोलिक परिस्थिति सौर व्यूह सहज ऊष्मा का दबाव के योगफल में किसी जीव शरीर में, से मानव शरीर का निष्पत्ति होना स्वाभाविक है क्योंकि प्राणकोशाओें में रचना विधियों का अनुसंधान होना साक्षित है। यह अनेक प्रजाति सहज अन्न वनस्पतियों के रूप में और अनेक प्रजातियों के रूप में जीव जंतु और पक्षी समूह के रूप में द्रष्टव्य है।

इसी क्रम में प्राण सूत्र सहज प्रकृतिगत विधि से मानव शरीर रचना विधि प्राण सूत्र में उर्मि सहज प्रक्रिया सम्पन्न होता है। प्राण सूत्र में उर्मि सहज प्रक्रिया का तात्पर्य जिस रचना विधि में प्राण सूत्र सम्पन्न रहता है उसके संयोग में आये रासायनिक उत्सव प्रवृत्ति ब्रह्माण्डीय किरण-विकिरण और ऊष्मा संयोगवश ही प्राण सूत्र के रचना विधि में परिवर्तन होना स्वभाविक है। इसी क्रम में मानव शरीर का पोषण और विकास आदि मानव से अभी तक संभव हो पाया है। इसका साक्षी यही है जीवन सहज जागृति और समझदारी को जीवन ही अपनी संतुष्टि (सुख,शांति, संतोष, आनंद के अर्थ में) को प्रकाशित, संप्रेषित, अभिव्यक्त सहज विधि से प्रमाणित करना संभव हो गया है, सहज हो गया है। इसका साक्ष्य हम स्वयं है। हम स्वयं का तात्पर्य समझदार मानव से है। अस्तु, अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था, आवश्यकता से अधिक उत्पादन, लाभ-हानि मुक्त विनिमय, प्रामाणिकता, मूल्य व मूल्यांकन विधि, स्वास्थ्य-संयम प्रक्रिया, मानवीय शिक्षा-संस्कार प्रणाली, पद्धति, नीति ये सब सहज पहचानने, निर्वाह करने में सुलभ होता है।

अस्तित्व सत्ता में संपृक्त अनंत ब्रह्माण्ड, सौर व्यूह वस्तु व पदार्थ के रूप में विद्यमान है। अनंत ब्रह्माण्डों में, से एक ब्रह्माण्ड का अंगभूत यह धरती अपने में सर्व समृद्ध संपन्न हो चुकी है। किसी भी धरती की सर्वसंपन्नता का तात्पर्य भौतिक व रासायनिक रचनाएँ पर्याप्त हो और जड़ तथा चैतन्य प्रकृति का कार्यकलाप जीवनी क्रम का कार्यक्रम संपन्न हो गया हो।

इस धरती में भौतिक व रासायनिक क्रियाकलाप परम्परा के रूप में स्थापित होने के उपरान्त तक, पदार्थावस्था व प्राणावस्था का समृद्ध होना भ्रमित मानव पहचानता है। इसी क्रम में जीवावस्था के जलचर, नभचर, भूचर जीवों को पहचानता है। इतना ही नहीं मानव परम्परा को अथवा मानव प्रकृति को भी इस धरती पर होना मानव भली प्रकार से पहचानता है। ऐसी भ्रमित

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