(1) आत्मा (2) ईश्वर (3) देवी-देवता।
सत्तामयता में संपृक्त प्रकृति का अध्ययन और अवधारणा के साथ-साथ ईश्वर विषयक रहस्य का उन्मूलन होता है एवं यथार्थता समझ में आ जाती है। जीवन ज्ञान अच्छी तरह से सम्पन्न होने के उपरान्त मानव में आत्मा संबंधी रहस्य दूर हो जाता है, क्योंकि जीवन में आत्मा अविभाज्य क्रियाशील, मध्यस्थ बल और शक्ति सम्पन्न वैभव है। मानव ही विकसित होकर मानवीयता पूर्ण मानव, देव मानव और दिव्यमानव के रूप में वैभवित होता है। यह समझ में आने के उपरान्त ही, शरीर से जीवन अलग होने की स्थिति में, देवी-देवता संबंधी रहस्यों से मुक्त होता है। इस प्रकार रहस्यों से छूटने का यर्थाथ उपाय, “अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन” से सुलभ हो जाता है।
अस्तित्व त्रिकालबाध वर्तमान और वैभव है। अस्तित्व नित्य वर्तमान होने के कारण अस्तित्व में रहस्य होने का कोई स्थान नहीं है। इस रहस्य में भ्रमित होने अर्थात् अस्तित्व में पूर्ण जागृत न होने के फलस्वरूप रहस्य की परिकल्पनाएँ हैं। यह मानव में कल्पनाशीलता, कर्म स्वतंत्रता का प्रकाशन है। जबकि अस्तित्वमूलक मानव केन्द्रित चिंतन ज्ञान अपने आप कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता को यथार्थता, वास्तविकता, सत्यता सहज विधि और विज्ञान से तथा विवेक सम्मत प्रणाली और समाधान पूर्ण पद्धति से अध्ययन सहज सार्थक स्वरूप प्रदान करता है। कल्पनाशीलता का तात्पर्य अनुरूप, प्रतिरुप, रूप, कुरुप, स्वरूप विधियों से चित्रित करने का कार्यक्रम है। ऐसे कार्यक्रम प्रत्येक मानव में परिलक्षित है। कर्म स्वतंत्रता का तात्पर्य आवश्यकता काँक्षा (कल्पित आवश्यकता) के अर्थ में कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित विधि से कार्य करने की स्वतंत्रता से है। यथार्थता का तात्पर्य जिसका जैसा अर्थ है। अर्थ का तात्पर्य स्वभाव से है। जैसे पदार्थावस्था में संघटन-विघटन; प्राणावस्था में सारक-मारक; जीवावस्था में क्रूर-अक्रूर तथा ज्ञानावस्था में धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, करूणा है। इसका अध्ययन संभव हो गया है, यद्यपि कुछ-कुछ अंशों में यथा पदार्थ, प्राण, जीवों में उक्त स्वभाव को पहचानने की क्षमता मानव में प्रमाणित है। मानव सहज स्वभावों को पहचानने में ही संदिग्धता बनी रही। इसके निराकरण के लिए ही मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान का प्रणयन और प्रस्ताव है।
वास्तविकता का तात्पर्य = वस्तु जैसा है। अस्तित्व में वस्तुओं का स्वरूप विभक्त और अविभक्त रूप में देखा जाता है। अविभक्त रूप सत्तामयता के रूप में देखा जाता है। विभक्त रूप में अनन्त