स्वयं में विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, जीवन-विद्या को विधिवत समझने से सार्थक हो जाता है। मानवीयता पूर्ण आचरण जो स्वधन, स्वनारी/स्वपुरूष तथा दया पूर्ण कार्य व्यवहार, तन-मन-धन रूपी अर्थ की सुरक्षा व सदुपयोग, संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, की संयुक्त अभिव्यक्ति ही है। जिसे प्रत्येक व्यक्ति आचरण करना चाहता है।

संविधान में मानवीयता पूर्ण आचरण सहज पहचान होना एक आवश्यकता है। उसके सर्वप्रथम प्रस्ताव निम्न प्रकार से श्रुतिबद्ध है।

मानवीय संविधान प्रस्ताव में जागृत मानव किसी न किसी परिवार में प्रमाणित होते हैं परिवार में हर व्यक्ति उनको उनके संपूर्णता के साथ पहचान करने योग्य होते हैं।

(1) सम्पूर्ण समझदारी श्रुति स्मृति पूर्वक मानव से मानव को, पीढ़ी से पीढ़ी को संप्रेषित होता है जिसमें से बोध होने पर्यन्त श्रुति है; बोध में जानने-मानने का स्वरूप है। इसका तृप्ति बिंदु अनुभव है। इसे प्रमाणित करने के क्रम में श्रुति, स्मृतिपूर्वक बोध कराया जाना पाया जाता है। प्रत्येक मानव की संपूर्णता अपने में भाषा, भाव, भंगिमा, मुद्रा, अंगहार सहित ही सार्थकता को पहचाना जाता है। श्रुति स्मृति पूर्वक मूल्यांकन करते है।

(2) जागृत मानव परिवार में हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेंदारी को पहचान पाता है। श्रुति स्मृति पूर्वक मूल्यांकन कर पाते है।

(3) आहार, विहार, विचार प्रवृत्तियों को व्यवस्था सूत्र के आधार पर प्रयोजनों के रूप में पहचानता है यह मूल्यांकन का आधार है। यह श्रुति स्मृति पूर्वक होता है।

(4) मानव का संबंध परस्परता में संबंध, मूल्य, मूल्यांकन, उभयतृप्ति विधि से पहचान होता है। यह सार्थकता के अर्थ में स्वीकार होना पाया जाता है।

(5) परिवार में परस्पर प्रवृत्तियों को कर्तव्य-दायित्वों को आवश्यकता से अधिक उत्पादन कार्य में एक दूसरे को पहचानते है। इसकी आवश्यकता बना ही रहता है।

(6) हर जागृत परिवार में परस्पर मूल्यांकन तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग सुरक्षा के आधार पर पहचानते है श्रुति पूर्वक मूल्यांकन करते है।

(7) परिवार में परस्पर स्वास्थ्य-संयम विधा में मूल्यांकन करते है। यह व्यवस्था में भागीदारी के क्रम में अति आवश्यक है इसका स्मृति श्रुति पूर्वक मूल्यांकन होता ही है।

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