से है। इस प्रकार स्वराज्य व्यवस्था के पाँचों आयाम परस्पर पूरक और गति है। इसके विशद अध्ययन के लिए समाधानात्मक भौतिकवाद, व्यवहारात्मक जनवाद और अनुभवात्मक अध्यात्मवाद मानव के लिए अर्पित है। ये तीनों वाद विज्ञान सम्मत विवेक, विवेक सम्मत विज्ञान विधि से तथा तर्क प्रणाली पहचान सकते हैं। इसी के साथ मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान शास्त्र, आवर्तनशील अर्थशास्त्र एवं व्यवहारवादी समाजशास्त्र अर्पित है। जागृति सहअस्तित्व स्वयं न्याय, धर्म व सत्य के रूप में व्यक्त है इस कारण अस्तित्व में मानव ही दृष्टा है इसलिए न्याय, धर्म, सत्य की पहचान मानव के लिए समीचीन है। इसी आधार पर भौतिकता समाधान क्रम में स्पष्ट होती है। न्याय मानव की परस्परता में है। सहअस्तित्व ही परम सत्य के रूप में है। अस्तित्व में अनुभव के आधार पर “सत्य” मानव परम्परा में निरंतर अभिव्यक्ति के लिए वस्तु है। इससे यह भी पता लगता है कि सत्य, धर्म, न्याय और नियमों को भाषा पूर्वक व्यक्त करना श्रुति है। इस प्रकार श्रुति का मूल रूप “सत्य” है। सत्य का स्वरूप नित्य वर्तमान ही है। वर्तमान स्वयं अस्तित्व है। इसलिए अस्तित्व ही परम सत्य है। अस्तित्व में, से, के लिए निभ्रमवादी सम्पूर्ण भाषा श्रुति है यह प्रमाणित होता है।

सत्य ही श्रुति का मूल रूप है। सम्पूर्ण आयाम, दिशा, कोण, परिप्रेक्ष्य, काल, देश, स्थिति, व गतियों में सामरस्यता को बनाए रखने के लिए श्रुति, स्मृति, बोध, अनुभव की आवश्यकता है। श्रुति को पहचानने के उपरान्त अथवा सत्य समझ में आने के उपरान्त आवश्यकतानुसार बारम्बार संप्रेषित, प्रकाशित व अभिव्यक्त करने के लिए प्रकाशोदय क्रिया स्मृति के नाम से जानी जाती है। इस प्रकार सत्य ही स्मृति का आधार है यह पाया जाता है। सत्य ही नियम न्याय व धर्म के रूप में परिप्रेक्ष्यानुसार समझ में आता है अथवा अवधारणा व अनुभव मूलक क्रम में प्रमाणित होता है। अनुभव मूलक विधि से सम्पूर्ण संप्रेषण कार्य (जो शिक्षा-संस्कार, संबंध, मूल्य, मूल्यांकन, व्यवस्था एवं व्यवस्था में भागीदारी) प्रधानतः स्मृति का वैभव है। सम्पूर्ण श्रुति को संप्रेषण रूप देना स्मृति का ही कार्य है। इसका प्रयोजन यह है कि मानव सहज जीने की कला में सत्य सहज अर्थ समाहित रहता है। प्रत्येक परिस्थिति में नियमों का अनुभव मूलक संप्रेषणा श्रुति है। उसे समय-समय पर आवश्यकीय परिप्रेक्ष्यों में प्रयोजनशील बना लेना जीने की कला है। यह स्मृति का वैभव है। न्याय अनुभव मूल स्मृति सहित श्रुति है। विविध संबंधों के साथ मूल्यों को मूल्यांकित करना व निर्वाह करना यह जीने की कला है। यह अनुभव मूलक स्मृति सहित श्रुति का वैभव है। व्यवस्था व व्यवस्था में भागीदारी जो स्वयं मानव धर्म है यही सर्वतोमुखी समाधान है। इसको विभिन्न विधाओं में सफलताओं को अनुभव मूलक विधि से संप्रेषणीय सार्थक बना

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