इकाईयों के रूप में देखा जाता है। प्रत्येक विभक्त रूप इकाई के नाम से संबोधित है। ऐसा प्रत्येक एक (इकाई) अपने वातावरण सहित सम्पूर्ण होता है। प्रत्येक एक का वातावरण होता ही है। परमाणु अंश भी उससे अधिक क्षेत्र में अपने गति प्रभाव को बनाए रखता है। यही प्रत्येक एक में संपूर्णता का तात्पर्य है। “वस्तु जैसा है ” - का उत्तर प्रत्येक एक अपनी संपूर्णता में वैभवित है।

सत्यता का स्वरूप सत्ता में संपृक्त प्रकृति है। अस्तित्व ही परम सत्य है। यही “स्थिति सत्य” के नाम से भी जाना जाता है।

“वस्तुस्थिति सत्य” को देश, काल, दिशा कोणों के रूप में पहचाना जाता है। प्रत्येक वस्तु में अनंत कोण होते हैं। सहअस्तित्व में दिशा स्पष्ट हो जाती है। देश का तात्पर्य ऊर्जामयता में नित्य स्थिति है। यही परम देश है। प्रत्येक विभाजित एक रासायनिक-भौतिक रचना होने के आधार पर, उसी में दो ध्रुवों को मानव स्थापित कर लेता है इससे उसकी सम्मुखता में दूरी का नाम अथवा लम्बाई का नाम है। दो से अधिक ध्रुवों को स्थापित करने से क्षेत्रफल का नाम आ जाता है। विभक्त इकाईयों की परस्परता में अपनी-अपनी संपूर्णता के साथ-साथ सत्तामयता में विभिन्न दिशा में विभिन्न इकाईयाँ होना पाया जाता है। इनकी परस्परता के बीच ऊर्जामयता ही दिखाई देती है। ऐसी परस्परता में जो दूरी दिखाई पड़ती है इसकी भी मानव ने गणना की है, और करने के प्रयत्न में रहता ही है।

काल का तात्पर्य क्रिया की अवधि से है। जिस क्रिया की अवधि से सारे काल को पहचाना जाता है ऐसी क्रियाओं को भुलावा देकर जब हम काल और काल विखंडन को पहचानने जाते हैं तब भ्रमित होना अवश्यंभावी है। काल के साथ क्रिया का क्रिया के साथ काल का संतुलन ही विभक्त काल ज्ञान की सार्थकता है।

विज्ञान का तात्पर्य कालवादी, क्रियावादी, निर्णयवादी ज्ञान से है। कालवादी चर्चा ऊपर स्पष्ट की जा चुकी है। क्रियावादी ज्ञान मूलतः इकाई में ऊर्जा संपन्नता और बल सम्पन्नता का साक्षात्कार करना है। प्रत्येक क्रिया के मूल में बल और शक्ति की अविभाज्यता दिखाई पड़ती है। शक्ति का प्रकाशन बल से संपन्न होने पर पाया जाता है। इस प्रकार बलों और शक्ति की अविभाज्यता स्पष्ट है। बल और शक्ति की संपूर्णता के साथ ही प्रत्येक एक वैभवित है। इसका मूल कारण अथवा मूल तथ्य सत्तामयता में सम्पूर्ण इकाईयों का संपृक्त रहना ही है। इस प्रकार क्रिया के मूल में विभक्त वस्तु और अविभक्त वस्तु (सत्ता) में सहअस्तित्व ही ऊर्जा सम्पन्नता की सहज स्थिति, गति स्रोत है। अविभक्त वस्तु (सत्ता) ही मूलतः ऊर्जा है यह स्पष्ट किया जा

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