विस्तार रूप सार्वभौम व्यवस्था अखंड समाज ही है। अतएव हर मानव जीवन जागृति पूर्वक ही श्रेय पद में अभ्युदय पूर्वक प्रमाणित होगा। फलस्वरूप पूज्यता के अर्ह (योग्य) होना स्वाभाविक है। पूज्यता का व्यवहार रूप अभ्युदय पूर्वक श्रेय पद प्रतिष्ठा को पाता है। अभ्युदय प्रतिष्ठा ही पूजा योग्य पद है। पूजा का लक्ष्य भी अग्रिम पद और प्रमाण प्रतिष्ठा है। श्रेय पद ही सम्पूर्ण मानव के लिये परम पद है। मुक्ति पद है। निरंतर अभ्युदय अर्थात् समाधानकारी अभिव्यक्ति संप्रेषणा कार्य व्यवहार प्रमाणित होता ही रहता है। ऐसी सार्थकता वश पूज्यता कृतज्ञता सहित जीवन जागृति पद में प्रतिष्ठित होने के लिए ही समझदार जागृत और प्रमाणित मानव के सान्निध्य में स्वाभाविक रूप में पूज्यता पूर्वक जिज्ञासा सहित प्रस्तुत होना पाया जाता है। ऐसी स्थिति में प्रेरणाओं को पाकर जो गति निर्मित होती है अर्थात् चिंतन प्रधान गति पहचान में आती है उसी का नाम श्रद्धा है। दूसरी भाषा में यही तथ्य इंगित होता है की श्रेय की ओर दिशा गतिशीलता। ऐसी गतिशीलता के लिए प्राप्त सभी प्रेरणाओं से जागृत प्रेरणाशील जागृत मानव के प्रति परम पूज्यता का प्रकाशन होता ही है। इस प्रकार श्रेय की ओर गतिशीलता श्रद्धा है और उसके लिए प्राप्त दिशा दर्शन लक्ष्य सहज स्पष्टता और स्वीकार पूर्वक ही प्रेरक के प्रति पूज्यता का प्रकाशन सहज होना पाया जाता है।

मानवीयता पूर्ण परम्परा में, से, के लिए श्रेय नित्य वर्तमान के रूप में समीचीन रहता है। समीचीनता का तात्पर्य सहज सुलभ समीप में होने से है। समीप का तात्पर्य जहाँ जो रहता है, उसका वहीं समीप में होना प्रमाणित होता है क्योंकि :-

(1) प्रत्येक मानव जीवन व शरीर के संयुक्त रूप में प्रकाशमान है।

(2) प्रत्येक जागृत मानव सही कार्य व्यवहार करता है।

(3) प्रत्येक मानव जागृति पूर्वक [M22.1]ही न्याय प्रदायी क्षमता को प्रमाणित करता है।

(4) प्रत्येक परिवार मानव स्वयं एक व्यवस्था है समग्र व्यवस्था में भागीदारी को प्रमाणित करता है।

(5) प्रत्येक जागृत मानव प्रामाणिकता को प्रमाणित करता है औरों को जागृत करना चाहता है।

(6) प्रत्येक जागृत मानव प्रामाणिकता पूर्वक ही वर्तमान रहता है।

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