दायित्व प्रधान रहता है। इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर आते है कि परम्परा ही आगे पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक है। लक्ष्योन्मुखी प्रवृत्ति के लिए दायित्व पीछे पीढ़ी के साथ जुड़ा रहता है। अतएव परम्परा जागृति होने के बाद ही परम्परा अपने सभी आयामों में जागृत होने के उपरांत ही भविष्य की पीढ़ियाँ जागृत होना और प्रमाणित होना पाया जाता है।

अब, मानव के वात्सल्य और सहजता को लोकव्यापीकरण प्रणाली में संबद्ध करने के लिए मानवीयतापुर्ण आचरण, व्यवहार व व्यवस्था को निरंतर बनाये रखना है यह जागृत परम्परा में स्वभाविक रूप में निर्वाह होना पाया जाता है। इस क्रम में वात्सल्य निरंतर सफल रहता है। साथ ही सभी मूल्य सार्थक होते है। मानवीयता पूर्ण मानव परम्परा में स्थापित मूल्यों में से एक वात्सल्य है। जो संबंध को पहचानने के फलस्वरूप होने वाला वैभव है। इसका आचरण में सहज होना पाया जाता है। हर मूल्य का अनुभव मुद्रा, भंगिमा, भाव, अंगहार सहित सम्बंधों में व्यक्त होना पाया जाता है। वात्सल्य के साथ जैसे भाषा को पीछे रखकर भाव प्रभावित हो जाता है फलतः बाल्य भाषा में ही अभिभावक माता-पिता बात करने लग जाते हैं। यह भाव वस्तु है। हर संबोधन संभाषण में शिशु की मुद्रा-भंगिमा अंगहार की व्याख्या भी होती रहती है। इसे तोतली भाषा भी कहते हैं। यह बारम्बार देखने को मिलता है। विश्वास, वात्सल्य के साथ वर्तमान रहता ही है। इसे अर्थात् वात्सल्य संबंध के साथ परम सरलता वर्तते हुए विश्वास का होना पाया जाता है। प्रत्येक जागृत मानव अपने को ऐसी स्थिति में निरीक्षण परीक्षण कर सकता है।

हर अभिभावक, माता-पिता के सर्वेक्षण करने पर यह पता चलता है कि वात्सल्य से ओतप्रोत रहने तक परम सरलता की स्थिति मानव की रहती है। सरलता का तात्पर्य यही है कि जागृति पूर्वक सम्बंधों को पहचानने के क्रम में मुद्रा, भंगिमा, अंगहार भाषा भाव सहित अर्थ की सदुपयोग सुरक्षा से करते हुए प्रस्तुत होने से है। हर संतान के साथ अर्थ का सदुपयोग करना संतान को सुविधाजनक विधि से पालन, पोषण, संरक्षण करता हुआ अभिभावक को देखा जाता है। हर अभिभावक जागृति के अनंतर संतान जागृति के लिए उपक्रमों को बनाये रखना सहज है। संतान एवं शिष्य में जागृति ही प्रधान लक्ष्य बना रहता है। क्योंकि स्वयं जागृत मानव परम्परा में गुरू और अभिभावक जागृत पद में होना पाया जाता है यह एक स्वभाविक समीचीन स्थिति है। परम्परा बहुआयामी विधि से प्रभावित रहता ही है। हर अभिभावक, गुरू, आचार्य संतान और विद्यार्थियों के प्रति जागृति सहज लक्ष्य, दिशा प्रयोजनों को प्रमाणित करने के क्रम में ये स्वयं

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