सहजता :- (1) स्पष्टता एवं प्रामाणिकता। (2) व्यवहार, रीति, विचार एवं अनुभव की एकसूत्रता।
वत्स (पुत्र-पुत्री) रूपी संबंध बोध के साथ ही वात्सल्य रूपी मूल्य का प्रकाशन होता है। यह वात्सल्य संतान व संतानवत् सम्बंधों का बोध सहित प्रत्येक परिवार मानव में देखने को मिलता है। सन्तान का रूप बोध होना लोक व्यापीकृत है। सन्तान का अर्थ बोध होना अपरिहार्य है। परिवार मानव को सन्तान में पारिवारिक अर्थ बोध होना सहज है।
वात्सल्य संबंध बड़े बुजुर्गों के साथ माता-पिता के साथ गुरू-आचार्यवत् व्यक्तियों के साथ वात्सल्य संबंध स्वीकृत होना पाया जाता है। संतानवत स्वीकारने का महत्वपूर्ण तथ्य इतना ही है कि तन, मन, धन का ऐसे वात्सल्य संबंध को निर्वाह करता हुआ व्यक्ति, नियोजित करता हुआ देखने को मिलता है। जैसे कोई भी सामान्य सज्जन परिवार में संतान होता है। उनके लिये उस संबंध के साथ उपलब्ध तन, मन,धन अर्थ का नियोजन करते है। मूलतः मानव अपेक्षा हर सम्बंधों की अक्षुण्णता के अर्थ में आरंभ होता है।
मानव जब जागृत परम्परा में होता है तब सम्पूर्ण संबंध और उसमें निहित मूल्यों की अक्षुण्णता बनी ही रहती है। फलतः परिवार में अक्षुण्णता, समाज में अक्षुण्णता का प्रमाण बना ही रहता है। इससे यह पता चलता है कि जीवन जागृति पूर्वक हम मानव संबंध और मूल्यों की अक्षुणाता को बनाये रख पाते है। संबंध और मूल्य कभी भी समाप्त नहीं होता है यह भी तथ्य सामान्य लोगों को पता है। मूल्य यथावत बना ही रहता है, संबंध भी बना ही रहता है, निर्वाह होता ही है।
मानव की जिज्ञासा के अनुसार सम्पूर्ण सम्बंधों का संबोधन प्रचालित है। इन सभी सम्बंधों में शुभेच्छा ही सर्वाधिक लोगों में आंकलित होता है। मानव सहज प्रयोजनों के अर्थ में सम्बंधों की दृढ़ता में निरंतरता रहता ही है। ऐसी दृढ़ता के आधार पर ही जागृति पूर्वक निष्ठा सहज स्वीकार होना पाया जाता है। सम्पूर्ण निष्ठा में मानव अपने दायित्व-कर्तव्यों को स्वीकारने की स्थिरता होना पाया जाता है फलस्वरूप व्यवस्था और व्यस्था में भागीदारी सहज हो जाता है। वात्सल्य सहज सम्बंधों का निर्वाह प्रमाणिकता के आधार पर ही सफल होना पाया गया है। हर बड़े-बुजुर्ग, आचार्य, गुरू, मित्र, परिवार, समाज व्यवस्था सम्बंधों के साथ अपेक्षाएँ श्रेष्ठता के अर्थ में ही बना रहता है। इसी प्रकार बड़े-बुजुर्ग, आचार्य-अभिभावक भी वात्सल्य प्रेरित मानव संतान को भावी श्रेष्ठ स्वरूप के अर्थ में ही अपेक्षा बनाये रखते है। ये उभयपक्षी अपेक्षाएँ सार्थक होने का जहाँ तक प्रमाण बिंदु है वहाँ तक पहुँचने में बड़े-बुजुर्ग आचार्य,अभिभावकों का ही