प्रमाणित रहना आवश्यकता बना ही रहता है। गुरू, आचार्य प्रमाणिकता के आधार पर शिष्य शिक्षा ग्रहण करने लिए सहज रूप में ही सुलभ हो जाता है और सार्थक होता है।

वात्सल्यता अपने आप में भावी पीढ़ी में जागृति को सार्थक बनाने में निश्चयन के साथ उत्सवित रहने का उद्गार ही वात्सल्य कहलाता है। हर सम्बंधों के साथ उत्सव के साथ ही उद्गार होना देखा गया है। ऐसे उद्गार स्वयं भाषा के रूप में, शब्द के रूप में स्वयं स्फूर्त होना पाया जाता है। हर मानव भाषा भाव भंगिमा, अंगहार समेत ही प्रस्तुत होता है इससे पता लगता है कि मानव परम्परा में भाषा भावों का संप्रेषित करने का एक सहज स्रोत है। भाव ही मौलिकता और मूल्य है। प्रमाणों में जितने भी तथ्य आये रहते है उसका भाषा तो बना ही रहता है एवं जो आये नहीं रहते है उसके संबंध में पहले से भी भाषा बना ही रहता है यही मानव परम्परा का अत्यंत प्रभावी अथवा अग्रिम गतिकारी अभिव्यक्ति है। सर्वाधिक विद्याओं में अनुसंधान न होने के पहले से ही अनुसंधान होने वाले वस्तु का नामकरण परम्परा में होना पाया जाता है जैसे अस्तित्व, सहअस्तित्व, सत्य, धर्म, न्याय, समाधान, नियम ये सब शब्द हर भाषा में प्रकारान्तर से परंपराओं में प्रचलित है ही।

क्योंकि सहअस्तित्व को परम सत्य के रूप में समझना; संबंध मूल्य मूल्यांकन उभय तृप्ति संतुलन को न्याय के रूप में; व्यवस्था में भागीदारी को समाधान के रूप में, सहअस्तित्व, जीवन और मानवीयता पूर्ण आचरण को समझदारी के मूल तत्व के रूप में; मानव जाति को अखंड समाज के अर्थ में मानवीयता पूर्ण व्यवस्था को सार्वभौम व्यवस्था के रूप मानवीयता पूर्ण शिक्षा संस्कार को संस्कृति, सभ्यता, विधि व्यवस्था के रूप में; मानव लक्ष्य को समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व के रूप में; मानव सहज लक्ष्य पूर्ति के लिए दिशा को व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में समझा गया है। इसे समझाने की व्यवस्था भी प्राप्त कर ली है। इसलिए अब हमें यह भरोसा है कि मानव संतान में, से, के लिए मानव परम्परा को जागृति पूर्वक लक्ष्य और दिशा के रूप में पहचानना संभव हो गया है। इन्हीं आधारों पर अथवा प्रामाणिक आधारों पर यह मनोविज्ञान अध्ययन के लिए प्रस्तुत हुआ है।

जागृत मानव परम्परा सहज विधि से हर संतान जागृति की ओर उन्मुख होने के लिए अभिभावकों में पर्याप्त उपक्रम बना ही रहेगा और गुरू आचार्य जागृति का प्रमाण के रूप में स्वाभाविक रहता ही है इसलिए हर संतान जागृत होने का लक्ष्य और दिशा सुस्पष्ट होना स्वाभाविक है। यही जागृति परम्परा का देन है। इसकी निरंतरता के लिए मानव परम्परा का मानवीयता पूर्ण पद्धति व प्रणालीबद्ध होना अनिवार्य है। स्थापित व शिष्ट मूल्यों को आचरण में पाने के लिए परिवार

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