मूलक स्वराज्य व्यवस्था को अपनाना आवश्यक है। प्रत्येक जागृत मानव परिवार मानव है। जागृत परिवार में ही वात्सल्य वर्तमान एवं अक्षुण्ण है। इसलिए जागृत मानव, जागृत मानव परिवार, अंखड समाज और सार्वभौम व्यवस्था को पहचानने की आवश्यकता है। क्योंकि मूल्यों की निर्वाह और अभिव्यक्ति क्रम में ही मानव का उत्सवित होना पाया जाता है। उत्सव मानव की अपेक्षा है।

अस्तु, परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था संपन्न मानव परम्परा में ही वात्सल्यादि सभी मूल्य संबंध सहज ही होना पाया जाता है। क्योंकि परिवार और विश्व परिवार सभी व्यवस्था पूर्वक नैसर्गिक और मानव सम्बंधों और मूल्यों का निर्वाह होना जागृत परम्परा की सहज गति है। इसकी आवश्यकता, अनिवार्यता, उपलब्धता निरंतर पूरक विधि से प्रभावशील रहता ही है। यही नियति है। नियति सहज क्रिया-प्रणाली पद्धति लक्ष्य और दिशा, प्रयोजन और सार्थकता सहज यर्थाथता, वास्ताविकता, सत्यता में जागृत रहने और जागृत करने के क्रम में ही मानव सहज जागृति वात्सल्य और सहजता सार्थक होना पाया जाता है।

15. श्रद्धा 16. पूज्यता

श्रद्धा :- (1) श्रेय की ओर गतिशीलता अर्थात् आचरण पूर्णता की ओर गुणात्मक परिवर्तन। (2) जागृति और प्रमाणिकता की ओर गति व उसकी निरंतरता।

पूज्यता :- गुणात्मक विकास और जागृति के लिए प्राप्त दिशा, दर्शन लक्ष्य सहज स्पष्टता और स्वीकार पूर्वक प्रेरक के प्रति पुज्यता का प्रकाशन होता है।

जीवन वैभव क्रम में अथवा जागृति क्रम में जो प्रेरणा, प्रमाण, कर्माभ्यास, व्यवहारभ्यास व चिंतनाभ्यास है उसके लिए प्राप्त सूत्र, व्याख्या, प्रेरणा, लक्ष्य और दिशा निर्देशन एवं स्वीकृतियाँ जीवन सहज है। इन सबका प्रयोग जीवन जागृति के लिए ही है। ऐसी प्रेरणा एवं निर्देशों को पाने के पहले से ही जीवन जागृति अथवा मोक्ष के प्रति तीव्र जिज्ञासा का होना देखा जाता है मोक्ष का तात्पर्य भ्रम मुक्ति से है। भ्रम मुक्ति जागृति से ही है। जागृत परम्परा में हर मानव को जागृति पूर्वक भ्रममुक्ति सहज है। नियति क्रम में भ्रम मुक्ति अथवा जीवन जागृति निश्चित है। जीवन ही जागृति पर्यन्त जिज्ञासु रहना जागृति सहज आवश्यकता को महसूस करता पाया जाता है। जीवन जागृति और प्रामाणिकता के योगफल में श्रेय पद है क्योंकि इसी पद में सम्पूर्ण समझदारी चरितार्थ रूप में प्रमाणित रहता है। समझदारी की चरितार्थता अर्थात् व्यवहार रूप अभ्यदुय है। इसका

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