अस्तु, जागृति पद ही श्रेय पद है। श्रेय की ओर ही अर्थात् समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी सहित प्रमाणित होने की लक्ष्य और दिशा स्पष्ट करने के रूप में होना पाया जाता है। जागृति जीवन में ही होती है स्वस्थ शरीर को संचालित करता हुआ जीवन जागृति और प्रमाणिकता को प्रमाणित करता है। शरीर स्वस्थता और जीवन जागृति के संयोग पूर्वक मानव परम्परा सार्थक है।

इसका तात्पर्य है कि प्रत्येक जागृत परिवार मानव के लिए अपने में स्वस्थता और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के क्रम में प्रमाणिकता का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। यही सार्थकता का तात्पर्य है। हर मानव सार्थक होना ही चाहता है। यह विकास और जागृति सहज स्वर है। जागृत मानव परम्परा का सार्वभौम व्यवस्था अखंड समाज के रूप में अभिव्यक्ति संप्रेषित प्रकाशित होना परम्परा का गौरव है। ऐसी गौरवमय परम्परा को पाने के क्रम में सर्वमानव में, से, के लिए कर्तव्य दायित्व समीचीन है। उसके लिए मानवत्व को पहचानना एक अनिवार्य स्थिति है। यही सर्वमानव परम्परा में मौलिक बिंदु है। इसे लोकव्यापीकरण करने के लिए मानव को अस्तित्व मूलक, मानव केन्द्रित चिंतन ज्ञान को हृदयंगम करना होगा।

श्रेय की ओर गतिशीलता सहज मानव में जागृति पूर्ण सम्पूर्ण मानव का अस्तित्व पूजनीय होना पाया जाता है। अस्तित्व में जागृति पूर्ण गुरूजनों, मनीषियों के प्रति पूज्यता होना सहज है। मनुष्येत्तर प्रकृति जलवायु, धरती, वनस्पति, नदी, समुद्र, पहाड़, मनुष्येत्तर जीव प्रपंच के साथ नैसर्गिकता के रूप में परस्पर पूरक होना पाया जाता है। यह जागृति पूर्वक स्वयं के प्रति पूरक होना समझ में आने का प्रमाण है।

मानव जागृति पूर्वक मूल्यांकन करता है। मूल्यांकन क्रम में परस्पर पूरकता का भी मूल्यांकन होता ही है। सहअस्तित्व ही मूल सूत्र है। पूरकता ही प्रक्रिया है। अतएव मानव मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ पूरक होना ही स्वयं स्फूर्त सार्थकता है इसका स्वरूप मनुष्येतर प्रकृति को नियंत्रित, नियमित, संतुलित रहने के लिए जागृत मानव पूरक होना मूल्यांकन का प्रमाण है।

यह प्रक्रिया परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्थापूर्वक ही होना स्पष्ट हुआ है और समझ में आया है। पूरकता व विकास परस्पर ध्रुव होने के कारण इसके योगफल में ही भौतिक-रासायनिक और गुणात्मक परिणाम, क्रियात्मक परिणाम फलन के रूप में घटित होना पाया जाता है। संतुलन नियंत्रण प्राकृतिक नियमों को जागृति पूर्वक मानव पालन करता है। फलस्वरूप मानव सहज पूरकता मनुष्येत्तर प्रकृति में प्रमाणित हो जाता है।

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