इसका कार्य रूप अर्थात् मानव मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ पूरक होने का कार्य रूप के आधार में यह धरती, धरती पर पाये जाने वाले सम्पूर्ण वैभव के साथ है। इसी का नाम जीव प्रकृति, वनस्पति प्रकृति, खनिज प्रकृति के नाम से जाना जाता है। यह धरती अपनी स्वस्थता को, सौंदर्य को, उत्सव को ऋतु संतुलन के रूप में ही प्रकाशित करता है। ऐसी यथास्थिति में मानव पूरक होना जागृत मानव सहज प्रमाण है। इसका क्रियान्वयन विधि संतुलित प्रकृति सहज वैभव के यथास्थिति को बनाये रखना लक्ष्य है। इसके लिए यह समझदारी जागृत मानव में ही होना पाया जाता है कि धरती का संतुलन के मूल में निश्चित मात्रा में खनिज और वनस्पति ही कारक तत्व और सार्थक तत्व है। यह एक ध्रुव है ऋतु संतुलन दूसरा ध्रुव है। इन दोनों के बीच में जो प्रक्रिया है वह संतुलन के अनुपात में खनिज और वनस्पति का संतुलन बनाये रखना जागृत मानव सहज पूरकता है और ऐसी संतुलन की अक्षुण्णता के लिए सहायक होना पूरकता है।
प्राकृतिक संतुलन के लिए आर्वतनशीलता भी आवश्यक प्रणाली है और धरती के ऊपरी सतह में जो कुछ भी वस्तुएँ है उनका अनुपाती अर्थात् प्राकृतिक संतुलन के साथ आहार, आवास, अलंकार, दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन वस्तुओं का उत्पादन उपयोग सदुपयोग करना प्रकृति के साथ मानव का पूरकता संपन्न होता हुआ प्रमाणित होता है। यह परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था विश्व परिवार के रूप में जागृत होने के उपरांत ही सार्थक सुलभ होना प्रमाणित होता है।
ऐसी परम स्थिति को पाने के लिए परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था को एक ग्राम या मुहल्ले में प्रमाणित करना ही शुभारंभ है इसके लिए हम कटिबद्ध है, प्रयत्नशील है। परिवार से ग्राम परिवार के साथ ही नैसर्गिक और मानव संबंध का पहचान और निर्वाह आरंभ होता और विश्व परिवार सभा तक विस्तृत होता है इसी क्रम में मानव तथा नैसर्गिक सम्बंधों का निर्वाह और पूर्ण तृप्ति और संतुलन सर्वसुलभ होता है। जागृति पूर्वक ही परम्परा में जागृति की ओर मानवीय शिक्षा-संस्कार पूर्वक लक्ष्य और दिशा निर्धारित और स्वीकृत हो जाता है फलस्वरूप इसका प्रमाण जागृति के रूप में हर पीढ़ी से पीढ़ी में सहज होता है। हर मानव शिक्षा-संस्कारपूर्वक ही जीवन जागृत होता है, प्रमाणित होता है यही परम्परा है। उसी के साथ यथार्थता, वास्तविकता, व सत्यताओं को जानने-मानने, पहचानने व निर्वाह करने की अर्हता बना ही रहता है। जागृत जीवन सदा ही अक्षय बल, अक्षय शक्ति सम्पन्नता को जानता है, मानता है और पहचान लेता है। निर्वाह करने के लिए तत्पर रहता है। ऐसा होते हुए जीवन शक्तियों का दूर दूर तक फैलने बहने की क्रियाकलापों के साथ प्रवर्तन व्यवस्था जीवन में समाई रहती है।