जीवन जागृति ही मानव का परम लक्ष्य है। दूसरा लक्ष्य स्वयं व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदार होना है। तीसरा लक्ष्य स्वयं समाजिक होना तथा अखंड समाज में भागीदारी का निर्वाह करना है। चौथा लक्ष्य समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व को प्रमाणित करना है। परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन करना समृद्धि का स्वरूप है। इन लक्ष्यों को पाने के लिए मानवीय शिक्षा-संस्कारों को पाना (अथवा उसका सर्वसुलभ होना) और स्वास्थ्य-संयम को बनाए रखना है।

स्वास्थ्य का तात्पर्य शरीर को जागृत जीवन मानव परम्परा में प्रमाणिक करने के अनुरूप कार्य करने योग्य बनाए रखना। इसका संतुलन जागृत परम्परा में सार्थक होता है। संयमता का तात्पर्य जागृत जीवन के संतुलन से है। जीवन जब श्रेय के लिए तत्पर होता है तब वह जीवन संतुलन के लिए उत्सुक है।

किसी भी देश, काल, स्थिति में जीवन के संतुलित होने का यही प्रणाली और पद्धति है। इसके आधार पर अर्थात् जीवन संतुलन के आधार पर मानव का श्रेय की ओर गतिशील होना और जागृत और प्रमाणित मानवों के प्रति पूज्यता का अभिव्यक्त होना स्वयंस्फूर्त व्यवहार सहज और नियति सहज है। नियति सहज का तात्पर्य नियंत्रणपूर्वक अर्थात् स्वभाव गति पूर्वक तत्परता से है। वह मानव में जागृति की ओर ही दिशा है। इस क्रम में मानव का श्रेय की ओर ही गतिशील जागृत, प्रमाणित होने की संभावना सहज समीचीन है।

॥ नित्यम् यातु शुभोदयम् ॥

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