जीवन में अविभाज्य रूप में क्रियारत

बुद्धि सहज चार आचरण

1. आनन्द 2. धी

आनन्द :- (1) अंतर्विहीन (बिना रुकावट के) उत्सव क्रिया। (2) नित्य उत्सव क्रिया।

धी :- उत्सवशीलता का प्रवर्तन क्रिया (परावर्तन के लिए तत्परता)।

अनुभव मूलतः आत्मा में सम्पन्न होने वाली क्रिया है। ऐसी अनुभव मूलक विधि से बुद्धि पर प्रमाणिकता का पूर्ण प्रभाव होता है यही आनन्द के नाम से जाना जाता है। अनुभव मूलक अवधारणाएँ जानने-मानने का तृप्ति सहित स्वीकृतियाँ है। ऐसा संतुलन सहज अवधारणा अनुभव मूलक विधि से ही संपन्न होना पाया गया।

यहाँ आनन्द और धी का अध्ययन है। इस क्रम में अनुभव के उपरान्त ही प्रत्येक स्थिति में आनन्द का कार्य स्पष्ट हुआ करता है।

आनन्द अपने में दृढ़ता का द्योतक है क्योंकि अनुभव ही परम जागृति है। जागृति सहज स्थिति और गति की स्वीकृति क्रिया परमता ही आनन्द और धी के नाम से जाना जाता है।

शब्दों में जो कुछ भी कहा जाता है वह किसी स्थिति-गति और उसका फल-परिणाम संबंधी स्थितियों का नाम है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि आनन्द अपने क्रिया में पूर्णता की स्वीकृति और उसकी निरंतरता है। सम्पूर्ण नाम का अर्थ इंगित वस्तु, क्रिया, स्थिति, गति सहज नित्य अभिव्यक्ति अस्तित्व में है, यही सार्थक रूप में पाया जाता है। हर वस्तु का अस्तित्व में ही अनुभव होना पाया जाता है क्योंकि सम्पूर्ण वस्तुएं अस्तित्व में ही नित्य वर्तमान हैं।

न्याय, धर्म, सत्य ही अस्तित्व सहज वैभव है जिसकी समझ अवधारणाएँ हैं। यह जीवन से सार्थक होने वाली वैभव है। सहअस्तित्व ही परम सत्य के रूप में वर्तमान मानव कुल में है। अस्तित्व में ही सम्पूर्ण रूप, गुण, स्वभाव, धर्म, स्थितियाँ, गतियाँ अवधारणा में होना पाई जाती हैं। अवधारणाएँ अनुभव मूलक प्रमाण हैं। अस्तित्व सत्ता में संपृक्त प्रकृति का नित्य वर्तमान और जागृत जीवन सहज रूप में नित्य अनुभूत होना पाया जाता है। फलस्वरूप अस्तित्व ही सहअस्तित्व के रूप में अवधारणा में होता है।

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