अस्तित्व में चारों अवस्थाओं का सहज स्वभाव और धर्म का अवधारणा में होना अनुभव का ही प्रमाण है। इससे अस्तित्व मूलक विधि से जानने-मानने की तृप्ति निरंतर आनन्द के रूप में है। धी उसमें परावर्तन दृढ़ता सहज कार्यरूप है।

जीवन सहज रूप में ही जीवन को जीवन के लिये जानता है, मानता है। इसको जाना गया है, माना गया है। इस जानने-मानने के क्रियाकलाप को इस विधि से समझा जा सकता है कि आत्मा को जानने-मानने का क्रियाकलाप बुद्धि में ही हो पाती है और बुद्धि को प्रमाणित करने का क्रियाकलाप आत्मा सहज रूप में मूल्यांकन सम्पन्न होता है। बुद्धि को पहचानने की क्रिया चित्त में संपन्न होती है यही “साक्षात्कार क्रिया” है। बुद्धि में संपन्न हुई आनन्द, धी, धृति, अस्तित्व का साक्षात्कार अर्थात् स्थिति- गति, रूप, गुण, स्वभाव, धर्म, जैसा है वैसे ही स्वीकार होता है। ऐसी स्वीकृत हुई वस्तु में रूप गुण का चित्रण चित्त में ही सम्पन्न होता है। चिंतन क्रिया चित्त में सम्पन्न होते है। जीवन में चित्त अविभाज्य क्रिया है। जबकि रूप और गुण का, स्वभाव और धर्म से अविभाज्य रहना पाया जाता है यह चित्त सहज चिंतन क्रिया में प्रमाणित होता है। जैसे विश्वास एक स्वभाव का ही साक्षात्कार है, स्वभाव का तात्पर्य मौलिकता और मूल्य से है। जबकि विश्वास चिंतन क्रियाकलाप में पहचानने के रूप में साक्षात्कार हो पाता है। इसी प्रकार सभी मूल्यों का चित्त में साक्षात्कार पूर्वक सम्पूर्ण चित्रण होता है। यह भी समझने के अर्थ में है। इसी के साथ बोध और अनुभव भी समझने के अर्थ में है सम्पूर्ण चिंतन देश, दिशा, काल मुक्त होना पाया जाता है। अस्तु, अनुभव बोध सहज आनन्द और धी का वैभव जागृत मानव में समझ में आता ही है। जागृत मानव का सम्पूर्ण समझ अध्ययन के लिए वस्तु होना पाया जाता है। अस्तु आनन्द और धी का प्रमाणिकता क्रम में सार्थकता स्वरूप को, कार्य को, लक्ष्य को स्पष्ट किया गया है। हमारा विश्वास है कि यह अध्ययन विधि से आनन्द और धी की सार्थकता अवश्य ही बोध सुलभ होता ही रहेगा।

अस्तित्व नित्य वर्तमान है और प्रमाण है। नित्यता और प्रमाण ही अक्षुण्ण अभिव्यक्ति के रूप में त्रिकालाबाध विधि से, सर्वदेश, सर्वकाल, सर्व दिशा में प्रमाणित है। अस्तित्व में अविभाज्य मानव ही ऐसे नित्य वर्तमान और नित्य प्रमाणों को प्रमाणित करता है करने के लिए इच्छुक है ही। इस प्रकार सम्पूर्ण अवधारणाएँ आनन्द और धी के रूप में होने वाले सम्पूर्ण क्रियाकलाप जागृति का ही साक्षी है। इस तथ्य के आधार पर प्रत्येक मानव प्रमाणों का आधार है। मानव का

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