आधार सहअस्तित्व में अनुभव ही है। इसका व्यवहार सहज व्यवस्था का प्रमाण होना सदा-सदा समीचीन है।

3. अस्तित्व 4. धृति

अस्तित्व :- (1) स्थिति, गति, विकास, जागृति और वर्तमान सहज निर्भ्रम स्वीकृति। (2) अध्ययन मूलक विधि से प्राप्त ज्ञान (जाना-माना, स्वीकार किया) = (जानना- मानना) (3) अस्तित्व = सहअस्तित्व।

धृति :- (1) सम्पूर्ण सहअस्तित्व सहज सत्य में निष्ठा और परावर्तित करने के लिए प्रवृत्ति। (2) सत्य या सत्यता का बोध सहज परावर्तन में निष्ठा।

अस्तित्व और धृति, बुद्धि सहज क्रिया है। बुद्धि में ही अध्ययन मूलक एवं अनुभव मूलक विधि से कार्यकलापों का सम्पन्न होना पाया जाता है। मानव में अध्ययन विधि का सूत्र कल्पनाशीलता प्रधान वस्तु है। इसका स्रोत जीवन सहज आशा, विचार, इच्छा का संयुक्त रूप में तत्पर रहना है। अध्ययन पूर्ण होने पर्यन्त कल्पनाशीलता की तृप्ति संभव न होने के कारण पुनःअध्ययन का कार्य मानव सहज है। मानव ही अध्ययन करने वाली इकाई है यह स्पष्ट हो चुका है। अध्ययन की परिभाषा ही है अधिष्ठान सहज अनुभव के साक्षी में स्मरण पूर्वक की गयी क्रिया-प्रक्रिया व प्रयास। इसका प्रमाण है, प्रत्येक जागृत मानव ही मानव को अनुभव मूलक विधि से बोध कराता है। इस विधि से अनुभव के लिए अध्ययन एक अनिवार्य प्रक्रिया है।

शरीर संचेतना अथवा इंद्रिय सन्निकर्षात्मक प्रभावों को भी अनुभव कहना प्रचलन में रहा है। जीवन संचेतना ही शरीर जीवन्त रहने पर्यन्त प्रमाणित रहती है। जीवंतता का स्रोत जीवन ही है। जीवन द्वारा अपनी आशा,विचार, इच्छा रूपी अक्षय शक्तियों का प्रभावन कार्य के आधार पर शरीर को जीवंत बनाए रखना एक सहज प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के आधार पर ही प्रत्येक मानव शरीर और जीवन में सहअस्तित्व प्रतिष्ठा स्थापित होने क्रियाशील रहने, शरीर यात्रा को सहज सुगम बनाए रखने और जीवन सहज उद्देश्यों को प्रमाणित करने का कार्य देखने को मिलता है।

इसका दृष्ट प्रमाण शरीर का जीवंत रहना अथवा न रहना ही प्रधान घटना है। ऐसी घटना प्रत्येक मानव के साथ और प्रत्येक मानव में प्रमाणित होती है यह सर्वविदित तथ्य है। ऐसी घटना को एक रासायनिक ऊर्मि के रूप में भी बुद्धिजीवी मानव ने दिखाने का प्रयत्न किया और कुछ

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